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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:18 · नई दिल्ली संस्करण

चीन की 'चीनी बौद्ध धर्म' मुहिम का विरोध: तिब्बती पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर उठे गंभीर सवाल

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
चीन की 'चीनी बौद्ध धर्म' मुहिम का विरोध: तिब्बती पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर उठे गंभीर सवाल

बीजिंग, । चीनी बौद्ध धर्म इन दिनों सुर्खियों में है। ये चीन की सत्तारूढ़ पार्टी की कथित सोच का नतीजा बताई जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ऐसी किसी भी धार्मिक या सामाजिक निष्ठा को लेकर सतर्क रहती है, जो पार्टी के प्रति वफादारी से अलग प्रभाव पैदा कर सकती है। इसी संदर्भ में तिब्बती बौद्ध धर्म को ‘चीनी बौद्ध धर्म’ के रूप में परिभाषित करने की बीजिंग की कोशिश को तिब्बती पहचान और धार्मिक परंपराओं को कमजोर करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

दलाई लामा के भतीजे खेद्रूब थोंडुप का एक लेख ‘द तिब्बत एक्सप्रेस’ में प्रकाशित हुआ है। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि बीजिंग का अभियान "केवल धार्मिक शब्दावली बदलने तक सीमित नहीं है," बल्कि इसका उद्देश्य धार्मिक संस्थानों और आस्था को राज्य के नियंत्रण में लाना है।

उन्होंने लिखा कि यह मामला धर्मशास्त्र से ज्यादा संप्रभुता से जुड़ा है और बीजिंग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई भी धार्मिक मंच, मठ या पूजा स्थल कम्युनिस्ट पार्टी से स्वतंत्र अधिकार या प्रभाव का केंद्र न बने।

थोंडुप के अनुसार, "चीन की कम्युनिस्ट पार्टी लंबे समय से धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय भर नहीं, बल्कि राज्य की सर्वोच्चता के लिए चुनौती के रूप में देखती रही है।

तिब्बती बौद्ध धर्म को ‘चीनी बौद्ध धर्म’ के रूप में पेश करना इसी व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत विभिन्न धार्मिक परंपराओं को पार्टी की वैचारिक व्यवस्था के अनुरूप ढालने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने दावा किया कि चीन में धार्मिक समुदायों को राज्य-नियंत्रित संगठनों के माध्यम से काम करना पड़ता है, जो धार्मिक नेताओं, शिक्षाओं और धार्मिक गतिविधियों की निगरानी करते हैं। उनके अनुसार, स्वतंत्र धार्मिक नेतृत्व की गुंजाइश सीमित है और मठों, चर्चों तथा मस्जिदों पर निगरानी रखी जाती है।

थोंडुप ने यह भी आरोप लगाया कि धार्मिक नेताओं को राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी शिक्षा दी जाती है, धार्मिक उपदेशों को नियंत्रित किया जाता है और राज्य की अनुमति के बाहर होने वाली धार्मिक गतिविधियों पर कार्रवाई की जाती है।

उन्होंने कहा कि तिब्बती बौद्ध धर्म केवल एक आध्यात्मिक परंपरा नहीं, बल्कि तिब्बती समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उनके अनुसार, इसे ‘चीनी बौद्ध धर्म’ कहना इसकी अलग धार्मिक परंपरा और पहचान को कमजोर करने का प्रयास है जो इसे चीन की राष्ट्रीय एकता की आधिकारिक अवधारणा से जोड़ता है।

थोंडुप ने दावा किया कि इस प्रक्रिया का एक उद्देश्य दलाई लामा के प्रभाव को भी कमजोर करना है।

उनके मुताबिक, दलाई लामा तिब्बती समुदाय के लिए आध्यात्मिक स्वतंत्रता के एक प्रमुख प्रतीक बने हुए हैं।

चीन में अन्य धार्मिक समुदायों की स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि ईसाई धार्मिक स्थलों पर क्रॉस हटाए गए, पादरियों को हिरासत में लिया गया और धार्मिक ग्रंथों को पार्टी के मूल्यों के अनुरूप ढालने के प्रयास किए गए।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ मस्जिदों को ध्वस्त किया गया, उइगर धार्मिक नेताओं की आवाज दबाई गई और कुरान पढ़ने पर प्रतिबंध लगाए गए। उनके अनुसार, कुछ स्थानीय धार्मिक परंपराओं को जीवंत धार्मिक आस्था के बजाय केवल ‘सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में पेश किया गया।

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