मुख्य सामग्री पर जाएँ
ब्रेकिंग
Rajasthan Panchayat Election 2026: पंचायत चुनाव का ऐलान, 4 चरणों में होगी वोटिंग, जानिए पूरा शेड्यूलमुंबई में CJP का प्रदर्शन पड़ा भारी! जेल भरो आंदोलन पर FIR, आयोजकों में हड़कंपज्ञानेश कुमार पर चले लोकतंत्र की हत्या का मुकदमा! प्रमोद तिवारी का बड़ा हमलाBJP का झंडा उतारने वाले संजयन त्रिपाठी अब साइकिल पर सवार, समाजवादी पार्टी में हुए शामिलCM Yogi का बड़ा तोहफा: 4.60 लाख छात्रों के खाते में आई छात्रवृत्ति, आपके खाते में आई क्या? चेक करेंNoida: सुपरनोवा की 43वीं मंजिल से युवक ने लगाई छलांग, मौके पर दर्दनाक मौत, सोसाइटी में हड़कंपमुंबई प्रदर्शन के बाद CJP का दिल्ली कूच का ऐलान, अभिजीत दिपके ने कही ये बड़ी बातगठबंधन में फूट! रायबरेली से डरते थे राहुल गांधी! सपा नेता का बड़ा खुलासा, अखिलेश ने दी थी धमकी

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:37 · नई दिल्ली संस्करण

मुरादाबाद के ककहरे ने सिखाई थी देशभर के लोगों को हिंदी

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
मुरादाबाद के ककहरे ने सिखाई थी देशभर के लोगों को हिंदी

मुरादाबाद। देशभर के लोगों को हिंदी मुरादाबाद के ककहरे ने सिखाई थी। वर्ष 1915 में मुरादाबाद के मास्टर रामकुमार द्वारा मात्र एक पैसे से प्रकाशित हिंदी सचित्र प्राइमर (रामकुमार का कायदा) की लोकप्रियता इस कद्र थी कि देश में करीब 18 करोड़ प्रतियां बिकी हैं। हालांकि वक्त के साथ घटते रुझान की वजह से पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 1997 में बंद हो गया।मंडी बास के जीलाल मोहल्ला निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मास्टर रामकुमार ने अमरोहा गेट पर अपनी दस फीट चैड़ी और 20 फीट लंबी दुकान में लेटर प्रेस पर 24 पृष्ठों की काले पन्नों वाली इस किताब का प्रकाशन एक पैसे की कीमत में शुरू किया था। बाद में पुस्तक को ऑफसेट प्रिंटिंग प्रेस रामकुमार प्रेस एंड एलाइड इंडस्ट्रीज पर प्रकाशित किया जाता था। वर्ष 1997 में पुस्तक की कीमत डेढ़ रुपये थी। बेहद सरल ढंग से हिंदी के अक्षरों, मात्राओं का ज्ञान कराने और सबसे ज्यादा सस्ती होने के कारण देशभर से इसकी मांग आती थी।मास्टर रामकुमार खुद उर्दू भाषा से पढ़े थे और फारसी भाषा के जानकार थेमुरादाबाद के वरिष्ठ साहित्यकार डा. मनोज रस्तोगी ने बताया कि मास्टर रामकुमार खुद उर्दू भाषा से पढ़े थे और फारसी भाषा के जानकार थे, लेकिन हिंदी का प्रचार-प्रसार और लोगों को अक्षर ज्ञान कराने के लिए पुस्तक का प्रकाशन किया था। उनके पिता का नौ सितंबर वर्ष 1962 को निधन हो गया था। परिवार में तीन पुत्र वीरेंद्र कुमार, सुरेंद्र कुमार (दोनों स्वर्गवासी) और महेंद्र कुमार हैं। उनके एक पोते की प्रिंटिंग प्रेस थी, जबकि दो पोते आशेंद्र कुमार सक्सेना अधिवक्ता और डॉ. स्वतंत्र अग्रवाल वरिष्ठ दंत रोग विशेषज्ञ व कोठीवाल डेंटल कॉलेज के प्राचार्य हैं।दिल्ली, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब व अन्य प्रदेशों में होती थी किताब की आपूर्तिमुरादाबाद के वरिष्ठ साहित्यकार डा. मनोज रस्तोगी ने बताया कि भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में काले-काले पन्नों वाली इस पतली सी पुस्तिका का योगदान हिंदी प्रसार को समर्पित किसी भी व्यक्ति या संस्था की तुलना में सबसे ज्यादा है। स्कूलों में भी पुस्तक पढ़ाई जाने लगी। जब किताब की आपूर्ति में परेशानी होने लगी तो बहुत से प्रकाशकों ने इस पुस्तक की हू-ब-हू नकल कर पुस्तकें प्रकाशित करना शुरू कर दिया था। दिल्ली, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब व अन्य प्रदेशों में किताब की आपूर्ति होती थी।लेकिन एक अभ्यर्थी ने लिखा कि मास्टर रामकुमार का कायदावर्ष 1951 में मुरादाबाद नगर में सब इंस्पेक्टर की परीक्षा थी। प्रतियोगियों से एक प्रश्न पूछा कि मुरादाबाद की सबसे प्रसिद्ध चीज क्या है। ज्यादातर अभ्यर्थियों ने कलई के बर्तन बताया, लेकिन एक अभ्यर्थी ने लिखा कि मास्टर रामकुमार का कायदा। इस जवाब से परीक्षक भी चकरा गया और जब उसने खोज शुरू की तो यह जवाब बिल्कुल सही मिला।

यह ख़बर दूसरों तक पहुँचाएँ

WhatsAppFacebookX

संबंधित ख़बरें