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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:40 · नई दिल्ली संस्करण

रंगपंचमी पर परंपरागत रूप से निकलने वाले ध्वज चल समारोह हमारे सांस्कृतिक गौरव का प्रतीकः मोहन यादव

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
रंगपंचमी पर परंपरागत रूप से निकलने वाले ध्वज चल समारोह हमारे सांस्कृतिक गौरव का प्रतीकः मोहन यादव

- सम्राट विक्रमादित्य के काल में अवंतिका नगरी में विजयी ध्वज निकाल कर मनाया जाता था उत्सवः मुख्यमंत्रीउज्जैन। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्राचीन अवंतिका नगरी में सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल के दौरान परंपरागत रूप से सैनिक छावनियों से सैनिक विजयी पताका और चिन्ह लेकर चल समारोह के रूप में नगर में निकालकर उत्सव मनाते थे। बाद में इस उत्सव को गेर का नाम दे दिया। यह प्राचीन परंपरा आज भी कायम है। यह परंपरा हमारे सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने यह बात रविवार को उज्जैन में रंगपंचमी पर निकलने वाले परंपरागत चल समारोह के शुभारंभ अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि इस प्राचीन परंपरा को आगे भी बनाए रखना है, इसके लिए नगर में परंपरागत रूप से निकलने वाले चल समारोह (गेर) के लिए सवा-सवा लाख रुपये की राशि प्रदान करने के निर्देश कलेक्टर को दिए हैं।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने रविवार सुबह श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंचकर भगवान श्री महाकाल का पूजन अभिषेक करने के बाद मंदिर के सभा मंडप में रंगपंचमी के अवसर पर ध्वज चल समारोह में निकलने वाले भगवान वीरभद्र जी के ध्वज और श्री महाकाल ध्वज के साथ ही शस्त्रों का विधि विधान पूर्वक पूजन किया। उन्होंने इस अवसर पर कलेक्टर रौशन कुमार सिंह को निर्देश दिए कि उज्जैन में परंपरागत रूप से निकलने वाले चल समारोह (गेर) की परंपरा को आगे भी कायम रखने के लिए सवा-सवा लाख रुपये की राशि दी जाए।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्राचीन उज्जैन नगरी में सम्राट विक्रमादित्य के काल के दौरान ध्वजा चल समारोह उत्सव के रूप में निकाला जाता था। इस उत्सव में अलग-अलग छावनी से सैनिक विजयी ध्वजा के साथ प्रतीक चिन्ह और शस्त्र लेकर रंग-गुलाल उड़ाते हुए निकलते थे। ध्वज चल समारोह ऐतिहासिक परंपरा है। बाद में इस उत्सव को गेर का नाम दे दिया गया। यह परंपरा आज भी कायम है। आगे भी इस परंपरा को जिंदा रखने के लिए नगर में परंपरागत रूप से निकलने वाले चल समारोह (गेर) को सरकार द्वारा राशि देकर सहयोग किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने परंपरा अनुसार रंग पंचमी पर्व के अवसर पर श्री महाकालेश्वर मंदिर में अलग-अलग ध्वज, प्रतीक चिन्ह और शस्त्र का पूजन कर शस्त्र का संचालन भी किया।मुख्यमंत्री ने भगवान महाकाल का पूजन कर ध्वज और शस्त्रों का पूजन कियारंगपंचमी के अवसर पर श्री महाकालेश्वर मंदिर से परंपरागत रूप से निकलने वाले श्री महाकालेश्वर ध्वज चल समारोह (श्री वीरभद्र ध्वज चल समारोह) के पूर्व सुबह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंच कर गर्भगृह में भगवान श्री महाकाल का पूजन कर देश व प्रदेश की खुशहाली की कामना भगवान महाकाल से की। पूजन के पश्चात नंदी हाल में मंदिर के पुजारी-पुरोहितों द्वारा स्वस्ति वाचन किया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भगवान महाकाल का ध्यान लगाया। इस अवसर पर कलेक्टर रौशन कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव को भगवान महाकाल का अंगवस्त्र, भगवान महाकाल का प्रसाद व स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मान किया।श्री महाकालेश्वर पूजन के पश्चात मंदिर के सभा मंडप में भगवान श्री वीरभद्र का पूजन अर्चन कर चल समारोह में शामिल होने वाले ध्वजों का पूजन किया। इस दौरान मंदिर पुजारी व पुरोहितों ने वैदिक मंत्रोच्चार कर पूजन कार्य सम्पन्न कराया। पूजन के पश्चात मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने महाकाल अखाड़े के प्राचीन शस्त्रों का पूजन कर शस्त्र संचालन और प्रदर्शन किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने ध्वज हाथ में लेकर मंदिर के कुंड परिसर तक गए।उल्लेखनीय है कि वर्ष में एक बार रंगपंचमी के अवसर पर श्री महाकालेश्वर मंदिर से श्री महाकालेश्वर ध्वज चल समारोह (श्री वीरभद्र जी का ध्वज) परंपरा अनुसार संध्या के समय पूजन अर्चन के बाद नगर भ्रमण के लिए रवाना होता है। इस दौरान बैंड-बाजे, भगवान की झांकी, परंपरागत शस्त्र, ध्वज भी चल समारोह में शामिल होते हैं।

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