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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:54 · नई दिल्ली संस्करण

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शादीशुदा बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से नहीं किया जा सकता बाहर

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शादीशुदा बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से नहीं किया जा सकता बाहर

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी शादीशुदा बेटी को 'कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट' पर विचार करने से सिर्फ इसलिए मना नहीं किया जा सकता, क्योंकि राज्य सरकार की पॉलिसी में ऐसी नियुक्तियां सिर्फ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियों के लिए ही हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा वर्गीकरण असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने सायरा खातून और उनकी बेटी की अपील को मंजूरी दे दी। उन्होंने यह अपील पटना हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ की थी, जिसमें पिता की मौत के बाद बेटी के 'कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट' के दावे को खारिज करने के फैसले को सही ठहराया गया था।

अपील करने वालों ने बिहार सरकार की 10 दिसंबर, 2014 की पॉलिसी पर सवाल उठाया था, जिसके तहत सिर्फ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटी ही 'कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट' के लिए योग्य मानी जाती है।

राज्य सरकार ने इस दावे को इस आधार पर भी खारिज कर दिया था कि मृतक कर्मचारी के भाई ने नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि भाई ने पहले ही 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (अनापत्ति प्रमाण पत्र) दे दिया था, और कहा कि 'अस्वीकृति का वह आधार अब खत्म हो गया है'।

तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियों तक ही 'कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट' को सीमित करने वाली पॉलिसी पर जस्टिस सुंदरेश की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में बेटों और बेटियों के बीच कोई भी भेदभाव संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कोर्ट ने बार-बार यह माना है कि बेटी और बेटे के बीच फर्क करने वाला कोई भी वर्गीकरण अपने आप में असंवैधानिक है।

कोर्ट ने आगे कहा कि सिर्फ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटी तक पात्रता को सीमित करने वाला वर्गीकरण कानून की नजर में टिक नहीं सकता।

बिहार सरकार की नीति के पीछे की धारणा को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी कोई धारणा नहीं हो सकती कि शादी के बाद बेटी अपने मायके से रिश्ते तोड़ लेती है और ससुराल में अपने पति के साथ रहती है।

आदेश में कहा गया कि अपीलकर्ता ने खास तौर पर बताया था कि भले ही कानूनी तौर पर उसके तलाक को औपचारिक मान्यता नहीं मिली थी, लेकिन वह अपने मायके में रह रही थी और उसे अपनी मां और भाई का सहयोग मिल रहा था।

बेंच ने कहा कि किसी भी स्थिति में बहुत ज्यादा तकनीकी दृष्टिकोण अपनाना उसके अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के दावे पर विचार करने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।

पटना हाई कोर्ट के आदेश और अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के दावे को खारिज करने के फैसले को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार अधिकारियों को अपीलकर्ता के मामले पर गुण-दोष के आधार पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रतिवादी (बिहार सरकार) को निर्देश दिया जाता है कि वह इस आदेश की प्रति मिलने की तारीख से आठ हफ्ते के भीतर अपीलकर्ता के अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के मामले पर गुण-दोष के आधार पर विचार करे।

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