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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:39 · नई दिल्ली संस्करण

दिल्ली का एआईआईए जहां कोरोना के एक भी मरीज की मौत नहीं हुई

राष्ट्रीय सागर डेस्क6 मिनट का पठन
दिल्ली का एआईआईए जहां कोरोना के एक भी मरीज की मौत नहीं हुई

नई दिल्ली। हर आयु में स्वस्थ रहें, इसी का नाम आयुर्वेद है। वात, पित्त और कफ पर आधारित यह शास्त्र लोगों के बीच गजब का भरोसा पैदा करने में सफल रहा है। हाल के दिनों में लोग बड़ी संख्या में अन्य पैथियों से आयुर्वेद की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। इसका सीधा तात्पर्य है, आयुर्वेद का क्रेज बढ़ गया है। आयुर्वेद की पद्धति से लेकर विभिन्न रोगों पर इसका प्रभाव जानने-समझने के लिए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) दिल्ली के डीन डॉ. महेश व्यास से हिन्दुस्थान समाचार समूह की पत्रिका युगवार्ता के संवाददाता राकेश कुमार ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश...सवाल- आयुर्वेद को चिकित्सा शास्त्र नहीं संस्कृति शास्त्र कहा जाता है, क्यों?जवाब- ब्रह्मा की सृष्टि से भी पहले इस शास्त्र का उल्लेख मिलता है। किसी व्यक्ति के जीवन जीने के तरीके (ज्ञान, नैतिकता और आदतें) को, जो परिभाषित करती है, वही संस्कृति है। मानव इससे अछूता नहीं है। इसी आधार पर इसे संस्कृति शास्त्र कहा जाता है। एक और बड़ी बात, आयुर्वेद न सिर्फ ज्ञात का बल्कि अज्ञात का भी शास्त्र है। हम मानव प्राणी के अलावा ब्रह्मांड (वातावरण) को भी अपने चिकित्सा शास्त्र में शामिल करते हैं।सवाल- वातावरण से इलाज का क्या अर्थ है?जवाब - बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा रोगी होते हैं। उससे कम गर्मी में और सबसे कम ठंड के मौसम में लोग बीमार होते हैं, क्यों? क्योंकि वातावरण का प्रभाव हर तरह के जीव पर पड़ता है। वात, पित्त और कफ का प्रभाव बहुत हद तक वातावरण पर निर्भर करता है। आपके आसपास का वातावरण संक्रमण रोग को फैलाने में बहुत ज्यादा जिम्मेदार होता है।सवाल- एआईआईए दिल्ली को बने अभी एक दशक भी नहीं हुआ है। आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?जवाब- कोई चुनौती नहीं है। कभी-न-कभी तो इसे करना ही था। इस सरकार ने इस शास्त्र में न सिर्फ दिलचस्पी दिखाई बल्कि एक अलग (आयुष) मंत्रालय भी बनाया। इस कारण न तो कोई समस्या आ रही है, न किसी का मोहताज होना पड़ता है। हम सारे चिकित्सकों का एक ही उद्देश्य है, संस्थान के मूल उद्देश्य की पूर्ति में हमसे कोई कमी न रह जाए।सवाल- वर्ष 2017 में पहला ओपीडी शुरू हुआ। तब से लेकर आज तक की यात्रा कैसी रही?जवाब- शानदार। सच और ईमानदारी से कहता हूं कि संस्थान इतनी जल्दी खड़ा हो जाएगा, ऐसा विश्वास बिल्कुल नहीं था। हम आशा से आगे निकल चुके हैं। आज हम गर्व से कहते हैं कि जो हमें कम करके आंकने का प्रयास किया जा रहा था। हमारी सफलता से उन लोगों को निराशा हुई होगी, जो इस शास्त्र पर शुरू से ही प्रश्नचिन्ह उठाते रहे थे।सवाल- कम करके आंकना, इसका क्या तात्पर्य है?जवाब- आयुर्वेद को कमतर बताया गया। इसके बारे में कहा गया कि ‘नीम-हकीम खतरे जान’, ‘घास-फूंस का शास्त्र’, इसमें रोगी को ठीक होने में बहुत वक्त लगता है। यही सब बातें कह-कहकर लोगों को भ्रमित और चिकित्सकों को हतोत्साहित किया गया लेकिन अब वक्त बदल चुका है। परिणाम सामने दिख रहा है। एक उदाहरण देता हूं। हाल के समय में सबसे खतरनाक रोग या वायरस कोविड था। कोविड मरीज अन्य चिकित्सा विज्ञान के उपचार से 10-12 दिन में स्वस्थ होते हैं। आयुर्वेद में 10-12 दिन अधिकतम है। इससे भी कम समय में कोरोना संक्रमित रोगी ठीक हुए हैं। जिसने भी हमारी भाषा, संस्कृति और शास्त्रों को विश्व में घूम-घूमकर कमतर बताने का कार्य किया, उसने दूसरों का क्या भला किया, पता नहीं पर अपना नुकसान बहुत ज्यादा कर लिया। इसकी भरपाई करने में बहुत ज्यादा समय लगेगा। यदि अंग्रेजी बोलने वाले सारे लोग विद्वान होते हैं, तो अमेरिका-इंग्लैंड में पैदा होने वाले सभी विद्वान होते।सवाल- कोरोना के समय आयुर्वेद का क्या योगदान रहा?जवाब- कोरोना तो पूरे विश्व में फैला था। हर जगह मरीज थे। कोई एक ऐसा अस्पताल नहीं बचा था, जहां कोरोना संक्रमित भर्ती न हुए हों। ठीक होने की संख्या नि:संदेह मरने वालों की संख्या से ज्यादा रही थी लेकिन हर अस्पताल में औसत दस से ऊपर ही मरीज उस दौरान मर रहे थे। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान में भर्ती एक भी मरीज नहीं मरा। क्या कोई अन्य अस्पताल ऐसा दावा कर सकते हैं? यह आयुर्वेद विज्ञान के महत्व को साबित करता है। फिर से दोहरा रहा हूं, हमारे संस्थान में कोरोना से एक भी रोगी काल-कवलित नहीं हुए।सवाल- फिर आयुर्वेद की इतनी मान्यता क्यों नहीं है?जवाब- ऐसा नहीं कह सकते। भले इसे लेकर एक गलतफहमी रही हो या फैलाई गई हो। पर संक्रमण काल अब खत्म हो गया। आज संस्थान में मरीजों की भीड़ इसे साबित करता है। कई मरीज तो ऐसे हैं, जो अन्य पैथी इलाज से थक-हारकर यहां आए हैं। वे प्राय: ठीक भी हो जाते हैं। अगर वही मरीज पहले आ जाएं तो क्या से क्या हो सकता है। मैं अन्य पैथी इलाज की उपेक्षा नहीं कर रहा। नि:संदेह आकस्मिक मरीज अन्य पैथी में जाएं, लेकिन अगर रोग है तो वह अपना इलाज आयुर्वेद में करवाएं। फिर उन्हें चमत्कारी परिणाम देखने को भी मिलेगा।सवाल- आयुर्वेद पिछड़ क्यों गया?जवाब- देेखिए, वर्तमान समय कहने-सुनने का नहीं रहा। एक हद तक इसे विश्वास करना कह सकते हैं। विश्वास का जमाना पीछे छूट गया। अब अपनी बात मनवाना पड़ता है। हमने यही तो किया। अपना शोध पत्र छपवाना शुरू किया। पहले हम कहते थे, यह करने से यह ठीक हो जाता है। अब हम इसमें वैज्ञानिक पद्धति का समावेश करते हैं। किसी मरीज को भर्ती करने के पहले उनकी जांच रिपोर्ट को लिखते हैं। फिर इलाज के दौरान हुए प्रभाव को लिखते हैं। बाद में चरण-दर-चरण हुए विकास को एक शोध पत्र में तब्दील कर उसे विश्व के जाने-माने जर्नल में छपवाते हैं। अब तो स्थिति यह हो गई है कि हमारे शोधपत्रों का एक हद तक कहें तो इतना प्रभाव है कि लोग अब छपने का इंतजार करते हैं। उदाहरण के लिए कोरोना के वक्त दिल्ली के 85 हजार पुलिसकर्मियों पर एक अध्ययन किया गया था। फिर उसे फ्रंटियर जर्नल में छपवाया भी गया था। सोलह सौ से अधिक शोधपत्र छप चुके हैं। कई और छपने वाले हैं। इसीलिए जब आयुर्वेद पिछड़ा था, तब पिछड़ा था। अब तो यह दुरंतो की भांति दौड़ रहा है।सवाल- आयुर्वेद में इलाज की पद्धति क्या है?जवाब- अन्य पद्धतियों के भांति ही इसमें भी वही सब किया जाता है। इसमें वात, पित्त और कफ के आधार पर रोगों को इलाज किया जाता है। हरेक रोगी के प्रकृति का अध्ययन करके ही हम मरीज का इलाज करते हैं। एक ही रोग में प्रत्येक व्यक्ति का इलाज अलग-अलग होता है। क्यों? क्योंकि हर व्यक्ति का अलग प्रकृति होता है। रोग के साथ-ही-साथ व्यक्ति के प्रकृति का भी अध्ययन करना इसमें बेहद जरूरी होता है। जैसे बुखार आने पर एक व्यक्ति को पांच सौ एमजी का दवा दिया जाता है, तो दूसरे को ढाई सौ एमजी का दिया जाता है। जबकि वह है तो बुखार ही। समान दवा देने से रोग खत्म होने के बजाय बढ़ भी सकते हैं। इसका बहुत ख्याल रखा जाता है।सवाल- व्यक्ति स्वस्थ कैसे रहे?

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