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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 8:38 · नई दिल्ली संस्करण

बिहार SIR के खिलाफ INDIA गठबंधन का विरोध जारी, संसद परिसर में लगाए गए पीएम मोदी और चुनाव आयोग के व्यंग्य चित्र

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
बिहार SIR के खिलाफ INDIA गठबंधन का विरोध जारी, संसद परिसर में लगाए गए पीएम मोदी और चुनाव आयोग के व्यंग्य चित्र

बिहार SIR के खिलाफ INDIA गठबंधन का विरोध जारी, संसद परिसर में लगाए गए पीएम मोदी और चुनाव आयोग के व्यंग्य चित्र

नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के दौरान आज INDIA गठबंधन ने बिहार में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ अपना विरोध और तेज कर दिया। विपक्षी सांसदों ने संसद भवन परिसर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ग्यानेश कुमार के व्यंग्यात्मक पोस्टर प्रदर्शित किए, जिनमें चुनाव आयोग को सरकार के इशारे पर काम करता दिखाया गया।

प्रदर्शित पोस्टरों में एक विशेष चित्र में प्रधानमंत्री मोदी को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की कमर में बेल्ट डालते हुए दिखाया गया, जबकि निर्वाचन आयुक्त 'YES SIR' बोलते हुए दिखाए गए। इस प्रतीकात्मक विरोध के माध्यम से विपक्ष ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सरकार के अधीन काम कर रहा है और SIR प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण है।

प्रदर्शन में शामिल प्रमुख सांसद

विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस के गौरव गोगोई, मणिकम टैगोर, हिबी ईडन, डीएमके की कनिमोळी, झामुमो की महुआ माजी और राजद के मनोज झा सहित कई विपक्षी सांसदों ने भाग लिया। उन्होंने बारिश के बावजूद संसद भवन के सामने पोस्टर थामे खड़े रहकर लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों की रक्षा की मांग की।

क्या है SIR और क्यों हो रहा विरोध?

बिहार में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई SIR प्रक्रिया के तहत करोड़ों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने की आशंका जताई जा रही है। EC के अनुसार, यह प्रक्रिया "मृत, स्थानांतरित या अप्राप्य" मतदाताओं को हटाने के लिए की जा रही है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इससे गरीब, दलित, आदिवासी, मुस्लिम और प्रवासी वर्ग के लाखों मतदाता बिना जानकारी के वंचित हो जाएंगे।

कांग्रेस सांसद रणदीप सुरजेवाला ने इस मुद्दे पर राज्यसभा में ‘कार्य स्थगन प्रस्ताव’ भी दिया है ताकि इस पर गहन चर्चा हो सके। विपक्ष की मांग है कि जब तक संसद में इस पर बहस नहीं होती, तब तक SIR प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।

सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस को झटका

गौरतलब है कि 28 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और विपक्षी दलों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक इस प्रक्रिया में कोई स्पष्ट असंवैधानिकता या कानूनी उल्लंघन प्रमाणित न हो, तब तक अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। यह निर्णय विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस के लिए एक कड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है, जो इसे राजनीति का मुद्दा बनाकर संसद और जनता को भटकाने का प्रयास कर रही थी।

दरअसल, कांग्रेस द्वारा उठाए गए तथाकथित "लोकतंत्र संकट" के शोर को न्यायपालिका ने तथ्यों की कसौटी पर खारिज कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि SIR एक प्रशासनिक और विधिसम्मत प्रक्रिया है, न कि कोई राजनीतिक साजिश। इससे कांग्रेस की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं कि वह इस मुद्दे को सिर्फ आगामी बिहार विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक एजेंडे को चमकाने के लिए उछाल रही है, बजाय इसके कि वह ईमानदारी से वोटर डेटा की शुद्धता को लेकर चिंतित हो।

राजनीतिक और संवैधानिक संदेश

अब जबकि संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक SIR प्रक्रिया को गैरकानूनी ठहराने का विपक्ष का प्रयास विफल हो चुका है, देश यह जानना चाहता है कि क्या कांग्रेस जैसे दल सिर्फ प्रतीकों और आरोपों के सहारे लोकतंत्र की छवि को धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं? संसद में किए जा रहे शोर और सड़क पर लगाए जा रहे पोस्टरों से इतर जब न्यायपालिका ने इस प्रक्रिया को बाधित करने से इनकार कर दिया, तब सवाल उठता है – क्या विपक्ष अब भी लोकतंत्र की मर्यादा समझता है?

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