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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:51 · नई दिल्ली संस्करण

गुजरात : सोलधरा गांव की ‘लखपति दीदी’, जिन्होंने गांव की भूमि पर आत्मनिर्भरता का एक नया इतिहास रचा

राष्ट्रीय सागर डेस्क4 मिनट का पठन
गुजरात : सोलधरा गांव की ‘लखपति दीदी’, जिन्होंने गांव की भूमि पर आत्मनिर्भरता का एक नया इतिहास रचा

गांधीनगर। ‘नारी शक्ति ही समाज की सच्ची शक्ति’ इस कहावत को सही मायने में सार्थक करती हैं गुजरात की चिखली तहसील के सोलधरा गांव की अस्मिताबेन अशोकभाई पटेल। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अस्मिताबेन और उनके आत्मनिर्भरता के सफर के बारे में जानकर ताज्जुब होगा कि एक किसान परिवार से आने के बावजूद आज उन्होंने अपना उद्योग संचालित करते हुए स्वयं के साथ 10 दूसरी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाया है, जो हमारे माननीय प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत मिशन’ को साकार करता है।

उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2026 में सूरत में वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (वीजीआरसी) दक्षिण गुजरात का आयोजन होने जा रहा है। इसमें स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों को वैश्विक बाजार के साथ जोड़ने पर बल दिया जाएगा। इस मंच के माध्यम से अस्मिताबेन जैसी महिला उद्यमियों को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का एक नया अवसर मिलेगा।

गुजरात की चिखली तहसील के सोलधरा गांव में जन्मीं अस्मिताबेन अशोकभाई पटेल का लालन-पालन एक किसान परिवार में हुआ। खेती और पशुपालन का ज्ञान उन्हें बचपन से ही घुट्टी में मिला। आर्ट टीचर डिप्लोमा (एटीडी) की पढ़ाई के दौरान ही पिता की मौत का आघात सहन करना पड़ा, लेकिन प्रगतिशील सास-ससूर और खुद का आत्मविश्वास ही उनकी ढाल बन गया। उन्होंने विवाह के बाद बीए की डिग्री हासिल की, और इस प्रकार ज्ञान और स्वयं के उत्कर्ष की यात्रा निर्बाध चलती रही।

खेती की आय सीमित थी, घर चलाना भी मुश्किल था। इस मुश्किल दौर में 2020-11 में अस्मिताबेन ने मधुमक्खी पालन का कोर्स पूरा किया।

उन्होंने घर पर ही शहद का उत्पादन शुरू किया और उसे बाजार में बेचा। 2014 में नवसारी कृषि विश्वविद्यालय से बेकरी कोर्स किया। यह उत्साह और जुनून ही उनकी पहचान बन गया।

2015 में अस्मिताबेन ने 10 महिलाओं के साथ ग्राम विकास अधिकारियों के मार्गदर्शन में ‘सह्याद्री सखी मंडल’ की स्थापना की।

शुरुआत आम, नींबू और करौंदा का अचार और मौसमी उत्पाद बनाने की गतिविधियों से हुई।

मिशन मंगलम के अंतर्गत 15,000 रुपए का रिवॉल्विंग फंड मिलने पर रागी (नागली) से बने उत्पाद, पापड़, बिस्कुट और आटे का उत्पादन शुरू हुआ। इन उत्पादों को स्थानीय, जिला और प्रादेशिक स्तर के कृषि मेलों में प्रदर्शित करने के साथ ही उनकी बिक्री की गई। बाद में, व्यावसायिक उद्देश्य से 2,00,000 रुपए का ऋण लिया और हल्दी प्रोसेसिंग और पीसने की मशीन खरीदी, जिससे प्राकृतिक हल्दी पाउडर का उत्पादन शुरू हुआ।

आज, सह्याद्री सखी मंडल की दूसरी महिलाओं के साथ मिलकर अस्मिताबेन ने प्राकृतिक और हाथ से बने खाद्य पदार्थों का उत्पादन शुरू कर दिया है।

आज, उनके स्वयं सहायता समूह की महिलाएं घर बैठे शहद पैकिंग और प्रोसेसिंग का कामकाज संभालती हैं, जबकि अन्य महिलाएं अचार, आंवले की कैंडी, नागली की वेफर्स और बांस के हस्तशिल्प उत्पाद बनाती और बेचती हैं। इन उत्पादों को स्थानीय बाजार में बेचने के साथ-साथ राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सरस मेलों में भी भव्य रूप से प्रदर्शित किया जाता है।

आज अस्मिताबेन की सालाना आय 10.20 लाख रुपए है, यानी आज वे न केवल एक लखपति दीदी हैं, बल्कि अपने गांव और समुदाय में एक सम्मानित और मार्गदर्शक महिला हैं। वे अपनी इस सफलता का श्रेय मिशन मंगलम योजना और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के गांवों की महिलाओं तक लाभ पहुंचाने के लिए किए गए प्रयासों को देती हैं।

अस्मिताबेन को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत उनके कार्य-प्रदर्शन के लिए अनेक पुरस्कार मिले हैं। उन्हें माननीय प्रधानमंत्री से तीन बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्हें गुजरात सरकार की ओर से ‘कृषि रत्न पुरस्कार’ प्राप्त हुआ है, साथ ही अप्रैल 2015 में जिला स्तर पर कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी – आत्मा अवॉर्ड भी मिला है।

अस्मिताबेन पटेल का सफर केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है, यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और टिकाऊ विकास का मॉडल है। सह्याद्री सखी मंडल ने स्थानीय कच्चे माले, पारंपरिक कुशलता और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके रोजगार सृजन की एक अनूठी मिसाल कायम की है।

अस्मिताबेन गर्व से कहती हैं, “जिस प्रकार एक मजबूत पेड़ की जड़ें एकता में होती हैं और उसकी शाखाएं अवसर मिलने पर फैलती जाती हैं, उसी प्रकार हमारा यह समूह भी आज मजबूती से खड़ा है।

” स्वरोजगार का उनका यह सफर साबित करता है कि जब महिलाएं एकजुट होती हैं, तब उनका विकास घर से समाज तक और वहां से देश के प्रत्येक कोने तक पहुंचता है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अस्मिताबेन जैसी ‘लखपति दीदीओं’ को सलाम, जो गांव की धरती से उठकर सह्याद्री जैसी अडिग शक्ति बन गई हैं और समाज में परिवर्तन का एक नया अध्याय लिख रही हैं।

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