ग्लोबल वार्मिंग, संभलने की वार्निंग उमाशंकर पाण्डेय

मनुष्य
का जल-जंगल-जमीन से रिश्ता आदिकाल से है। बिना इनके जीवन की कल्पना नहीं
की जा सकती। आज सबसे बड़ा संकट ग्लोबल वार्मिंग का है। इससे सारी दुनिया
चिंतित है। ग्लोबल वार्मिंग ने कई तरह की दुश्वारियां पैदा की हैं। पृथ्वी
का तापमान बढ़ने (ग्लोबल वार्मिंग) और उसकी वजह से होने वाला जलवायु
परिवर्तन आज प्रकृति की तबाही की सबसे महत्वपूर्ण कारक है। पृथ्वी के औसत
तापमान में बढ़ोतरी या ग्लोबल वार्मिंग मुख्यतः कार्बन उत्सर्जन की तेजी से
बढ़ती दर और कम होते जंगलों का परिणाम है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों
में इस साल चली भयंकर लू का मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग ही है। वैज्ञानिकों
का मानना है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग नहीं रुकी तो शताब्दी के आखिर तक
पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के पहले के स्तर से 2 डिग्री बढ़
जाएगा और इससे लू की तीव्रता और नियमितता 30 गुना बढ़ जाएगी। दैनिक अनुभव से
भी हम यह जानते हैं कि सिर्फ तपती गर्मी या लू से उतनी तकलीफ नहीं होती
जितनी तकलीफ गर्मी और उमस के एकसाथ होने से होती है। ग्लोबल वार्मिंग से
हवा का तापमान बढ़ता है और गर्म हवा ठंडी हवा के मुकाबले ज्यादा वायुमंडल की
नमी वहन करती है।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण जहां प्रति वर्ष लू की
स्थिति अधिक दिनों तक और ज्यादा तीव्रता के साथ लोगों को अपनी जद में ले
रही है। दूसरी ओर हर साल शीत लहर का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। 1980 से
2018 के बीच शीत लहर के कारण हुई मौतें लू से हुई मौतों से ज्यादा थीं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2020 में शीतलहर से 152 लोगों की मौत हुई। जनवरी
2021 में उत्तर भारत के हर राज्य में औसत मासिक अधिकतम तापमान सामान्य से
2-4 डिग्री कम था। वैज्ञानिकों के अनुसार शीत लहर की बढ़ती अवधि और तीव्रता
का मुख्य कारक ग्लोबल वार्मिंग और विशेष तौर पर आर्कटिक इलाके का ऊष्मीकरण
है। अबतक यह एक स्थापित तथ्य माना जाता था कि आर्कटिक वृत्त पृथ्वी के बाकी
हिस्सों के मुकाबले दोगुनी तेजी से गर्म होता है। लेकिन पिछले साल नासा से
जुड़े कुछ वैज्ञानिकों के नए शोध के अनुसार आर्कटिक वृत्त असल में दोगुनी
नहीं बल्कि चौगुनी तेजी से गर्म हो रहा है। लांसेट स्वास्थ्य जर्नल में
2021 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में असामान्य तापमान के कारण हर
साल सात लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। इनमें से 6.5 लाख लोगों की मौत
असामान्य ठंडे तापमान और औसतन 80 हजार लोगों की मौत असामान्य गर्म तापमान
के कारण होती है। असामान्य तापमान के कारण मरने वाले लोग आमतौर पर समाज के
निचले तबके से आते हैं।
लू और शीतलहर के अलावा ग्लोबल
वार्मिंग के कारण एक और भयानक प्रक्रिया घटित हो रही है। यह प्रक्रिया है
हिमनदियों और ध्रुवीय हिमच्छदों (पोलर आइस कैप्स) का तेजी से पिघलना और औसत
समुद्र तल (मीन सी लेवल) का लगातार बढ़ना। अगले कुछ दशकों में शंघाई, हॉन्ग
कॉन्ग, ओसाका, रिओ, एम्स्टर्डम, अलेक्सान्द्रिया जैसे दुनियाभर के कई
तटवर्ती शहरों के बड़े हिस्सों के जलमग्न हो जाने की आशंका है। मुंबई,
चेन्नई, विशाखापट्टनम, कोच्चि, तिरुवनन्तपुरम आदि शहरों के कुछ इलाके 2050
तक जलमग्न हो सकते हैं। समुद्र स्तर के बढ़ने से आने वाली बाढ़ के कारण समंदर
का खारा पानी जमीन के अंदर रिसकर चला जाएगा। इससे भूमिगत जल भी खारा बन
जाएगा। इससे स्वच्छ पानी की उपलब्धता भयंकर विकराल रूप ले लेगी, क्योंकि आज
ही मीठे पानी की समस्या गम्भीर समस्या बन चुकी है। तब क्या होगा इसकी
कल्पना से कलेजा फटने को हो जाता है। पेयजल के बिना जीवन की कल्पना मुश्किल
है। भूमिगत जलस्तर के लवणीकरण के कारण तटीय इलाकों में कृषि उत्पादन पर भी
प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
एक बदलाव यह भी हुआ है कि पहले
मानसून के दौरान कुल बारिश जितनी होती थी उसकी तुलना में आज काफी कम होती
जा रही है। बाढ़ की नियमितता और तीव्रता बढ़ती जा रही है। अचानक से कुछ दिनों
के लिए मूसलाधार बारिश होती है तो बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। एक-दो
सप्ताह में ही इन इलाकों में सूखे की स्थिति बाढ़ की स्थिति में तब्दील हो
जाती है। सूखे और बाढ़ का लगभग साथ-साथ होना और अनियमित बारिश ग्लोबल
वार्मिंग और बदलती जलवायु का ही परिणाम है। देश में 2011 से 2020 के बीच
हर साल औसतन 1500 लोग बाढ़ में काल कलवित हो हुए हैं।
ग्लोबल
वार्मिंग के कारण महासागरों की सतह के तापमान में बढ़ोतरी और वायुमंडल में
मौजूद जल वाष्प (वाटर वेपर) का अनुपात दोगुना होने से दुनियाभर में चक्रवात
और तूफान पहले से अधिक नियमित तौर पर आने लगे हैं। इनकी तीव्रता में भी
बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। भारत आज भयंकर रूप से सूखा ग्रस्त देशों की श्रेणी
में शामिल है। 2020 से 2022 के बीच देश का दो-तिहाई हिस्सा सूखे की चपेट
में था। देश के एक तिहाई जिले पिछले एक दशक में चार बार सूखा झेल चुके हैं।
भारत में प्रति वर्ष पांच करोड़ लोग सूखे से प्रभावित हो रहे हैं। संयुक्त
राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार सूखे के कारण आज लगभग 230 करोड़ लोग जल
संकट का सामना कर रहे हैं। इसमें से 1.6 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो भयंकर और
दीर्घकालिक सूखे से जूझ रहे हैं। पिछले पचास साल में सूखे से 6,50,000
लोगों की मौत हुई है। माना जाता है कि ग्लोबल वार्मिंग, अनियमित बारिश,
जंगलों की कटाई और भूमिगत जलस्तर में तेज गिरावट को देखते हुए यह तय है कि
सूखा और जल संकट आने वाले दिनों में और बढ़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु
परिवर्तन और अनियमित बारिश के कारण कृषि उत्पादन पर भी नकारात्मक प्रभाव
पड़ा है। वैश्विक खाद्य नीति रिपोर्ट 2022 के अनुसार 2050 तक भारत में सात
करोड़ लोग जलवायु परिवर्तन के कारण भुखमरी का शिकार हो सकते हैं।
(लेखक,
जल संरक्षण के लिए पुरखों की परंपरागत विधि 'खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़'
अभियान के सूत्रधार हैं। उन्हें इस अभियान को धरातल पर उतारने के लिए
सरकार पद्मश्री से अलंकृत कर चुकी है।)





