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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:43 · नई दिल्ली संस्करण

ग्लोबल हिंदू गठबंधन ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर कार्रवाई की मांग की

राष्ट्रीय सागर डेस्क4 मिनट का पठन
ग्लोबल हिंदू गठबंधन ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर कार्रवाई की मांग की

वॉशिंगटन। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा लगातार बढ़ती जा रही है। चुनाव की तारीख के ऐलान के बाद से हर दिन किसी ना किसी हिंदू को निशाना बनाया गया। अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ रही हिंसा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जाहिर की जा रही है।

हिंदू और कई धर्मों को मानने वाले समूहों के एक ग्लोबल गठबंधन ने बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा के लिए तुरंत अंतरराष्ट्रीय एक्शन लेने की मांग की है। समूहों ने कहा कि हिंसा, धमकी और जबरदस्ती हटाने का लगातार पैटर्न बना हुआ है।

हिंदूज एडवांसिंग ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (एचएएचआरआई) ने अंतरराष्ट्रीय एक्शन की मांग की है। यह हिंदूपैक्ट की एक पहल है। समूह ने कहा कि 15 देशों के 125 से ज्यादा संगठनों और लोगों ने इस अपील से संबंधित पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।

चिट्ठी में सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दखल देने की अपील की गई है।

एचएएचआरआई के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राहुल सुर ने कहा, "बांग्लादेश के हिंदू देश के मूल निवासी हैं, जिन्हें यूएन कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ इंडिजिनस पीपल्स, 2007 के तहत भेदभाव से अपनी जिंदगी और संस्कृति की सुरक्षा का हक है। हम जो देख रहे हैं, वह बिल्कुल उल्टा है। यह कभी-कभार होने वाली हिंसा या अलग-थलग अराजकता नहीं है।

यह एक लगातार चलने वाला मानवाधिकार संकट है जिसकी जड़ में सजा से छूट है।"

चिट्ठी में हत्याओं और भीड़ की हिंसा का जिक्र किया गया है, जिसका हाल ही में बांग्लादेश में उदाहरण देखने को मिला। इसके अलावा चिट्ठी में मंदिरों और घरों पर हमलों का जिक्र है। इसमें हिंदुओं को टारगेट करने के लिए ईशनिंदा के आरोपों के इस्तेमाल की ओर भी इशारा किया गया है।

इसमें 18 दिसंबर, 2025 को दीपू चंद्र दास की सरेआम हत्या का जिक्र किया गया है।

उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था। हत्या का वीडियो ऑनलाइन बहुत फैल गया। इस घटना ने दुनिया भर का ध्यान खींचा।

सबमिट के मुताबिक, बांग्लादेश में अगस्त 2024 और 30 नवंबर 2025 के बीच अल्पसंख्यकों पर 2,673 हमले हुए। ये हमले पिछली सरकार के हटने के बाद हुए। गठबंधन ने कहा कि हिंदू समुदाय में डर फैल गया है।

चिट्ठी में उन अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया है, जिसमें अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग भी शामिल है और 2025 में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती धमकी और हिंसा का जिक्र है।

हिंदूपैक्ट के फाउंडर और एग्जीक्यूटिव चेयर अजय शाह ने कहा कि डेमोग्राफिक बदलाव एक गहरी समस्या दिखाता है।

शाह ने कहा, "सिर्फ ये नंबर ही एक भयानक कहानी बताते हैं। एक लोकतंत्र चुनिंदा तौर पर अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकती। जब लगातार हिंसा और धमकी के कारण कोई अल्पसंख्यक इस पैमाने पर सिकुड़ती है, तो यह सरकार और ग्लोबल सिस्टम की नाकामी है, जिसका मकसद ऐसे नतीजों को रोकना है।"

गठबंधन ने कहा कि 1951 में बांग्लादेश की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 22 फीसदी थी।

यह आंकड़ा अब 7 फीसदी से कम है। इसने कहा कि हर साल लगभग 230,000 हिंदू देश छोड़ देते हैं। समूह ने इस ट्रेंड को धार्मिक हत्या बताया।

इसके अलावा, चिट्ठी में अमेरिका से कार्रवाई करने की अपील की गई है। इसमें वाशिंगटन से एक फैक्ट-फाइंडिंग टीम भेजने के लिए कहा गया है। इसमें ट्रेड पेनल्टी लगाने की अपील की गई है। इसमें सताए गए हिंदुओं के लिए रिफ्यूजी प्रोटेक्शन की मांग की गई है। इसमें यूएन पीसकीपिंग मिशन में बांग्लादेश की भूमिका की समीक्षा करने की भी मांग की गई है।

अपील में यूरोपीय यूनियन से सजा देने वाले टैरिफ लगाने की अपील की गई है। इसमें ईयू जांच मिशन की भी मांग की गई है। एचएएचआरआई की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं इन गलत कामों की निंदा करें और उल्लंघन की एक स्वतंत्र जांच की मांग करें।

एचएएचआरआई ने कहा कि 25 से ज्यादा अमेरिकी शहरों में रैलियां की गईं। समूहों ने यूएन हाई कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स को एक याचिका भी दी। इसमें कहा गया कि दुनिया भर में हजारों लोगों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं।

सूर ने कहा, “याचिका, रैलियां और फॉर्मल सबमिशन मिलकर दिखाते हैं कि यह चिंता सिर्फ नीति बनाने के स्तर तक ही सीमित नहीं है। सभी धर्मों के आम नागरिक मांग कर रहे हैं कि सार्वभौमिक मानवाधिकार मानक को एक जैसा लागू किया जाए।”

बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा इससे पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है। यूएन रिपोर्ट्स और अमेरिकी कांग्रेस में पहले भी उठाया गया है। भारत और अमेरिका ने भी क्षेत्रीय और बहुपक्षीय फोरम में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को उठाया है।

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