क्या बढ़ने लगा Gen Z और Gen Alpha का दबाव? आंदोलन के बाद जाग रही सरकारें

Gen Z और Gen Alpha केवल दर्शक नहीं हैं; वे एक मजबूत "डिजिटल प्रेशर ग्रुप" बन चुके हैं। सरकारें अब समझ चुकी हैं कि युवाओं के असंतोष को नजरअंदाज करना नीतिगत और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर भारी पड़ सकता है।
अब तक देश में सरकार के खिलाफ़ 'जेन Z' विरोध कर रहा था, लेकिन अब 'जेन अल्फा' भी इस दौड़ में शामिल हो गया है। असल में, पहली बार 'जेन अल्फा' (2010 और 2025 के बीच पैदा हुए बच्चे) उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। बच्चे क्लासरूम में पंखे, साफ़ पानी, ठीक-ठाक टॉयलेट, टीचर, बेहतर खाना, डेस्क और स्कूल तक जाने वाली सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए विरोध कर रहे हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सिर्फ़ कोई स्थानीय विवाद नहीं है, बल्कि भारत में 'जेन अल्फा' का अपनी तरह का पहला ऐसा विरोध है जो कई राज्यों में फैला हुआ है।
Gen Z (और उनके पीछे आ रही Gen Alpha) का सामाजिक और राजनीतिक दबाव वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रहा है, और सरकारें इसके प्रति सचेत होकर कदम उठाने पर मजबूर हो रही हैं। डिजिटल युग में पली-बढ़ी यह पीढ़ी पारंपरिक राजनीति और धीमी प्रशासनिक व्यवस्था से अलग हटकर अपनी मांगें सीधे और आक्रामक तरीके से रख रही है। हाल के वर्षों में भारत सहित कई देशों (जैसे नेपाल, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, केन्या) में युवाओं के बड़े आंदोलनों ने यह साबित कर दिया है कि वे नीतिगत बदलाव करा सकते हैं।
सख्त शैक्षणिक और प्रतियोगी माहौल: पेपर लीक, फर्जीवाड़े और कोचिंग माफिया से परेशान युवा छात्र सड़कों पर उतरकर सीधे जवाबदेही मांग रहे हैं।
रोजगार की चिंता: डिग्री होने के बाद भी गुणवत्तापूर्ण रोजगार न मिलना युवाओं में सबसे बड़ी निराशा का कारण है।
डिजिटल एकजुटता: Gen Z किसी राजनीतिक दल के बैनर के बिना सोशल मीडिया (X, Instagram, Discord) के जरिए मिनटों में गोलबंद होकर आंदोलन खड़ा कर देती है।
जानकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विरोध अचानक या बिना किसी वजह के शुरू नहीं हुआ। बल्कि, एक साल पहले नेपाल में 'जेन ज़ेड' (Gen Z) युवाओं ने भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर लगी रोक के खिलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन करके सरकार को सत्ता से हटा दिया था। भारत में, हाल ही में जंतर-मंतर पर NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ़ CJP का 50 दिनों तक चला विरोध-प्रदर्शन खत्म हुआ; इसी के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा था।





