सुप्रीम कोर्ट में पहली बार लागू हुई SC-ST आरक्षण नीति: अब कर्मचारियों की सीधी भर्ती और प्रमोशन में मिलेगा आरक्षण का लाभ

सुप्रीम कोर्ट में पहली बार लागू हुई SC-ST आरक्षण नीति: अब कर्मचारियों की सीधी भर्ती और प्रमोशन में मिलेगा आरक्षण का लाभ
नई दिल्ली, 2 जुलाई 2025 — भारत की न्याय व्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक बदलाव के तहत, देश की सर्वोच्च अदालत – सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार कर्मचारियों की सीधी भर्ती और प्रोन्नति (प्रमोशन) में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण नीति को लागू किया है। यह कदम न्यायिक संस्थानों में समावेशिता, समान अवसर और सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ी पहल माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन द्वारा जारी 24 जून 2025 के सर्कुलर में इस नीति की आधिकारिक घोषणा की गई है। इस सर्कुलर के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के सभी कर्मचारियों को औपचारिक रूप से सूचित किया गया है कि अब से उनकी सीधी नियुक्तियों और आंतरिक पदोन्नतियों में आरक्षण का प्रावधान लागू होगा। यह निर्णय सर्वोच्च न्यायपालिका में समानता और प्रतिनिधित्व के मूल संवैधानिक आदर्शों को मजबूती देता है।
इस नई नीति के अनुसार, सीधी भर्तियों और प्रमोशन दोनों में SC वर्ग को 15 प्रतिशत और ST वर्ग को 7.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। यह आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न पदों — जैसे कि रजिस्ट्रार, सीनियर पर्सनल असिस्टेंट, जूनियर कोर्ट असिस्टेंट, असिस्टेंट लाइब्रेरियन और चैंबर अटेंडेंट — पर लागू होगा। अभी तक सुप्रीम कोर्ट की भर्ती प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं था, लेकिन इस फैसले ने दशकों पुराने एक अधूरे मोर्चे को पूरा किया है।
सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक व्यवस्था Supnet पर इस आरक्षण नीति से संबंधित मॉडल रोस्टर और आरक्षण रजिस्टर अपलोड कर दिए गए हैं, जिससे सभी संबंधित विभागों और अधिकारियों को इसका पालन सुनिश्चित करने में सुविधा होगी। नीति 23 जून 2025 से प्रभावी मानी जा रही है और कर्मचारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि यदि किसी को इससे संबंधित कोई आपत्ति या सुझाव है, तो वह रजिस्ट्रार (भर्ती) को लिखित में जानकारी दे सकता है।
इस ऐतिहासिक फैसले से देश के लाखों युवाओं को एक स्पष्ट संदेश गया है कि अब न्यायपालिका के सर्वोच्च संस्थान में भी सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को गंभीरता से अपनाया जा रहा है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट को एक आदर्श नियोक्ता के रूप में स्थापित करता है और यह भी दर्शाता है कि अदालत सिर्फ न्याय बांटने का स्थान नहीं, बल्कि न्याय को अपने भीतर भी लागू करने की इच्छाशक्ति रखती है।
इस फैसले से यह भी उम्मीद की जा रही है कि अन्य संवैधानिक संस्थान और न्यायिक इकाइयाँ भी इससे प्रेरणा लेंगी और अपने-अपने स्तर पर समावेशिता और समानता के प्रति प्रतिबद्धता को और सशक्त करेंगी।





