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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:35 · नई दिल्ली संस्करण

‘आर्थिक दबाव’ अभियान भी अमेरिका की पिछली नीतियों जैसा नाकाम रहेगा: अराघची

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
‘आर्थिक दबाव’ अभियान भी अमेरिका की पिछली नीतियों जैसा नाकाम रहेगा: अराघची

तेहरान। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा है कि अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ शुरू किया गया आर्थिक दबाव अभियान भी उसकी बाकी दबाव वाली नीतियों की तरह नाकाम रहेगा।

अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्‍स' पर लिखा, "14 साल पहले: 'इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध' नाकाम रहे। आठ साल पहले: 'अधिकतम दबाव' नाकाम रहा। पांच महीने पहले: 'बिना शर्त आत्मसमर्पण' नाकाम रहा।

आज: 'अब तक का सबसे कठोर आर्थिक अभियान' यह भी नाकाम रहेगा।"

समाचार एजेंसी स‍िन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को घोषणा की कि ईरान को सहयोग करने वाले किसी भी देश के खिलाफ 'अब तक का सबसे कठोर आर्थिक अभियान' चलाया जाएगा।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, "यह अभूतपूर्व स्तर का आर्थिक युद्ध और अलगाव होगा।"

उन्होंने इस कदम को 'इकोनॉमिक डी-डे' भी बताया।

इससे पहले ईरान के कानूनी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के उपविदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा था कि अमेरिका अब 'आर्थिक युद्ध' के नाम पर ईरान पर और दबाव बना रहा है।

उनके मुताबिक, यह वॉशिंगटन की पिछली नाकामियों को छिपाने की कोशिश है।

ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, गरीबाबादी ने सोशल मीडिया पर कहा कि एक तरफ अमेरिका दावा कर रहा है कि ईरान 'गिरने की कगार पर है', लेकिन दूसरी तरफ वह अपने सभी सहयोगी देशों से मदद मांग रहा है।

उन्होंने कहा कि अपनी नाकामी छिपाने के लिए अमेरिका को उससे भी बड़ी नाकामी पैदा करनी पड़ रही है। उनका कहना था कि सैन्य कार्रवाई से कोई नतीजा नहीं निकला, इसलिए अब वॉशिंगटन अगली हार को 'आर्थिक युद्ध' का नाम दे रहा है।

18 जून को अमेरिका और ईरान ने क्षेत्र में चल रहे संघर्ष को सभी मोर्चों पर खत्म करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे।

इसमें लेबनान से जुड़ा मोर्चा भी शामिल था।

इस समझौते के तहत दोनों देशों को 60 दिनों के भीतर बातचीत करके अंतिम समझौते तक पहुंचना था। यह अवधि सोमवार को समाप्त हो गई। हालांकि, पिछले महीने दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव के बाद इन वार्ताओं का भविष्य अभी भी स्पष्ट नहीं है।

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