धार भोजशाला विवाद: राजा भोज के सरस्वती सदन से हाई कोर्ट के फैसले तक, 1000 साल पुराने इतिहास की पूरी कहानी

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क्या है भोजशाला का इतिहास?
इतिहासकारों के अनुसार 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा Raja Bhoj ने धार को शिक्षा और संस्कृति का बड़ा केंद्र बनाया था। कहा जाता है कि उन्होंने यहां “सरस्वती सदन” या “भोजशाला” की स्थापना की थी, जहां संस्कृत, ज्योतिष, व्याकरण और दर्शन की शिक्षा दी जाती थी।
भोजशाला परिसर में मां सरस्वती की प्रतिमा होने के भी उल्लेख मिलते हैं। ब्रिटिश काल में यहां से मिली एक प्रसिद्ध सरस्वती प्रतिमा बाद में British Museum पहुंच गई, जिसे लेकर आज भी बहस होती रहती है।
कमाल मौला मस्जिद का दावा कैसे जुड़ा?
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि 14वीं शताब्दी में यहां सूफी संत कमाल मौला से जुड़ी मस्जिद स्थापित हुई थी। इसी कारण परिसर को “कमाल मौला मस्जिद” भी कहा जाता है। समय के साथ दोनों समुदायों ने इस स्थल पर अपने-अपने धार्मिक अधिकारों का दावा करना शुरू कर दिया।
अंग्रेजों के दौर में शुरू हुआ प्रशासनिक नियंत्रण
ब्रिटिश शासन के दौरान भोजशाला परिसर को संरक्षित स्मारक माना गया। लेकिन धार्मिक दावों को लेकर तनाव बना रहा। स्वतंत्रता के बाद यह विवाद और गहराता गया।
2003 का एएसआई आदेश
Archaeological Survey of India ने 2003 में व्यवस्था बनाई कि:
मंगलवार को हिंदू पक्ष पूजा करेगा।
शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष नमाज अदा करेगा।
अन्य दिनों में नियंत्रित प्रवेश रहेगा।
अगर शुक्रवार को वसंत पंचमी पड़ती है, तो विवाद और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि उस दिन हिंदू पक्ष सरस्वती पूजा करना चाहता है।
एएसआई सर्वे और नए दावे
हाल के वर्षों में भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और पुरातात्विक अध्ययन चर्चा में रहा। हिंदू संगठनों ने दावा किया कि परिसर में मंदिर जैसी संरचनाओं और प्रतीकों के प्रमाण मिले हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष ने इन दावों का विरोध किया और मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान बनाए रखने की मांग की।
हाई कोर्ट में मामला
Madhya Pradesh High Court में इस मामले को लेकर कई याचिकाएं दायर की गईं। अदालत ने समय-समय पर प्रशासन और एएसआई को व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए।
हाल के आदेशों में हाई कोर्ट ने एएसआई सर्वे की निगरानी, सुरक्षा व्यवस्था और धार्मिक गतिविधियों के संतुलन पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था और ऐतिहासिक तथ्यों दोनों का ध्यान रखना जरूरी है।
क्यों संवेदनशील है यह मामला?
यह विवाद धार्मिक आस्था से जुड़ा है।
हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्ष इस स्थल को ऐतिहासिक रूप से अपना मानते हैं।
पुरातात्विक साक्ष्यों की अलग-अलग व्याख्या की जाती है।
हर सुनवाई और त्योहार के दौरान प्रशासन को विशेष सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ती है।
वर्तमान स्थिति
भोजशाला परिसर फिलहाल एएसआई के नियंत्रण में है। प्रशासन अदालत के निर्देशों और तय नियमों के अनुसार पूजा और नमाज की व्यवस्था लागू कराता है। हालांकि यह विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और अदालत में सुनवाई जारी है।





