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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:05 · नई दिल्ली संस्करण

बाढ़ से त्रस्त भागलपुर, 8.5 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित, दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रही आबादी

भागलपुर। जिले में गंगा नदी के रौद्र रूप धारण करने से बाढ़ की स्थिति अत्यंत भयावह हो गई है। जिले के 111 गांव और 437 वार्ड पूरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं, जिससे 2,00,102 परिवारों के 8,56,379…

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन19 बार पढ़ा गया
बाढ़ से त्रस्त भागलपुर, 8.5 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित, दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रही आबादी

भागलपुर। जिले में गंगा नदी के रौद्र रूप धारण करने से बाढ़ की स्थिति अत्यंत भयावह हो गई है। जिले के 111 गांव और 437 वार्ड पूरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं, जिससे 2,00,102 परिवारों के 8,56,379 लोग गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं।

गंगा पार के इलाकों में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक बने हुए हैं। पूर्व मंत्री बुलो मंडल के आवास के आसपास के इलाके में भी अब तक गर्दन तक पानी भरा हुआ है, और पानी कब उतरेगा, इसे लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। बाढ़ की विभीषिका को देखते हुए जिला प्रशासन और एसडीआरएफ की टीमें राहत कार्यों में मुस्तैद हैं।

आपदा प्रभावित क्षेत्रों से अब तक 24,812 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है। आवागमन और रेस्क्यू के लिए 122 नावों का परिचालन किया जा रहा है। स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए 80 चिकित्सा केंद्र सक्रिय किए गए हैं, जबकि पशुओं की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रभावित पशुओं की संख्या 79,390 तक पहुंच गई है। भूख से निपटने के लिए प्रशासन द्वारा 317 सामुदायिक रसोई चलाई जा रही हैं।

सरकारी दावों और प्रयासों के बावजूद जमीन पर बेघर परिवारों की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। सैकड़ों परिवार ऊंचे स्थानों पर शरण लेकर खानाबदोश की जिंदगी जीने को विवश हैं। बाढ़ के इस संकट ने परिवारों के भीतर पारंपरिक जिम्मेदारियों को भी बदल कर रख दिया है। पीड़ित बताते हैं कि चारों तरफ लबालब पानी भरे होने के कारण बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बन गई है। अनहोनी के डर से महिलाएं चौबीसों घंटे बच्चों की निगरानी में जुटी हैं, ताकि वे खेलते हुए पानी की तरफ न चले जाएं। वहीं दूसरी ओर, पुरुष अब परिवार के लिए भोजन जुटाने और पकाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

बाढ़ प्रभावित इलाकों में कई जगहों पर सामुदायिक किचन चलने के बावजूद लोग अपने स्तर पर भी चूल्हा जलाने का प्रयास कर रहे हैं, जो किसी जंग से कम नहीं है। चारों तरफ पानी होने के कारण सूखी लकड़ियां मिलना नामुमकिन हो चुका है।

बाढ़ पीड़ितों ने बताया कि जो भी जलावन उपलब्ध है, वह पूरी तरह भीगा हुआ है। ऐसे में भीगी लकड़ियों को सुलगने और आग जलाने के लिए घंटों हाथ से पंखा झेलना पड़ता है, तब कहीं जाकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो पाता है। वहीं बाढ़ का पानी उतरने की धीमी रफ्तार ने ग्रामीणों के सामने आजीविका और सुरक्षा का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

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