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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 6:25 · नई दिल्ली संस्करण

बांग्लादेश: ग्लोबल प्रेस फ्रीडम ग्रुप की अपील, आईसीटी को पत्रकारों के खिलाफ न किया जाए इस्तेमाल

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
बांग्लादेश: ग्लोबल प्रेस फ्रीडम ग्रुप की अपील, आईसीटी को पत्रकारों के खिलाफ न किया जाए इस्तेमाल

न्यूयॉर्क। एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रेस फ्रीडम ग्रुप ने बांग्लादेशी अधिकारियों से पत्रकार फरजाना रुपा और मोजम्मेल बाबू को रिहा करने का आग्रह किया है। दोनों को अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) में दर्ज एक मानवता विरोधी अपराध मामले में हिरासत में लिया गया था।

सीपीजे यानी द कमिटी टू प्रोटेक्ट जनर्लिस्ट्स (प्रेस स्वतंत्रता संरक्षण समिति) ने अधिकारियों से इस न्यायाधिकरण का इस्तेमाल पत्रकारों को निशाना बनाने के लिए बंद करने का अनुरोध किया।

आईसीटी ने 14 मई को फरजाना रुपा, मोजम्मेल बाबू और पूर्व मंत्री दीपु मोनी को 2013 में ढाका के शापला चत्तार में हुए हिफाजत-ए-इस्लाम रैली विरोधी कार्रवाई से जुड़े मामले में गिरफ्तार करने का आदेश दिया।

न्यायाधीश मोहम्मद गोलाम मोर्तुजा मजुमदार की अध्यक्षता वाली बेंच ने आरोपियों को जेल भेजा और 7 जून को जांच रिपोर्ट जमा करने की तारीख तय की।

सीपीजे के अनुसार, अभियोजकों का आरोप है कि रुपा ने घटना के बाद एकोत्तर टीवी पर प्रसारित रिपोर्ट में "विवादित व्यक्तियों" के बयान शामिल किए और "भ्रामक जानकारी" फैलाई, जिससे कार्रवाई में हुई हत्याओं से ध्यान भटक गया।

उस समय चैनल के प्रबंध निदेशक रहे बाबू पर प्रसारण की निगरानी और मृत्युदर छुपाने के प्रयास का आरोप है।

सीपीजे के एशिया-प्रशांत प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर कुणाल मजुमदार ने कहा, "पत्रकारों के संपादकीय निर्णय मानवता के खिलाफ अपराध नहीं हैं, और अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक ढांचे का इस्तेमाल पत्रकारों को दंडित करने के लिए करना बांग्लादेश के संविधान और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संविधानों का उल्लंघन है। संगठन ने अधिकारियों से तुरंत रुपा और बाबू को रिहा करने और आईसीटी का हथियार की तरह इस्तेमाल कर पत्रकारों को निशाना बनाने की नीति बंद करनी चाहिए।

रूपा और बाबू अगस्त और सितंबर 2024 के पहले से ही अलग-अलग हत्या मामलों में हिरासत में हैं।

11 मई को उच्च न्यायालय ने रुपा को छह मामलों में अंतरिम जमानत दी, लेकिन आईसीटी मामले समेत लंबित मामलों के कारण वह अभी भी जेल में हैं। आईसीटी को मूल रूप से 2010 में बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध (1971) के अपराधों की सुनवाई के लिए गठित किया गया था।

मोहम्मद युनूस की अंतरिम सरकार ट्रिब्यूनल में बदलाव लेकर आई। इस अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सजा ए मौत का फरमान भी सुनाया।

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