मुख्य सामग्री पर जाएँ
ब्रेकिंग
Rajasthan Panchayat Election 2026: पंचायत चुनाव का ऐलान, 4 चरणों में होगी वोटिंग, जानिए पूरा शेड्यूलमुंबई में CJP का प्रदर्शन पड़ा भारी! जेल भरो आंदोलन पर FIR, आयोजकों में हड़कंपज्ञानेश कुमार पर चले लोकतंत्र की हत्या का मुकदमा! प्रमोद तिवारी का बड़ा हमलाBJP का झंडा उतारने वाले संजयन त्रिपाठी अब साइकिल पर सवार, समाजवादी पार्टी में हुए शामिलCM Yogi का बड़ा तोहफा: 4.60 लाख छात्रों के खाते में आई छात्रवृत्ति, आपके खाते में आई क्या? चेक करेंNoida: सुपरनोवा की 43वीं मंजिल से युवक ने लगाई छलांग, मौके पर दर्दनाक मौत, सोसाइटी में हड़कंपमुंबई प्रदर्शन के बाद CJP का दिल्ली कूच का ऐलान, अभिजीत दिपके ने कही ये बड़ी बातगठबंधन में फूट! रायबरेली से डरते थे राहुल गांधी! सपा नेता का बड़ा खुलासा, अखिलेश ने दी थी धमकी

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 6:50 · नई दिल्ली संस्करण

न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक, मीडिया को भी हिदायत

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने करौली जिले के हिंडौन थाना इलाके

में दुष्कर्म पीडिता के 164 के बयान होने के दौरान प्रताडना और एससी-एसटी

एक्ट के आरोप मामले में दर्ज एफआईआर में हिंडौन के तत्कालीन न्यायिक

मजिस्ट्रेट के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। वहीं

मामले में राज्य सरकार, केन्द्रीय सूचना व प्रसारण मंत्रालय के सचिव, राज्य

के सीएस, गृह सचिव, डीजीपी, एसपी करौली व पीडिता सहित अन्य को नोटिस जारी

कर जवाब तलब किया है। इसके साथ ही अदालत ने मामले की सुनवाई 27 मई तय की

है। जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने यह आदेश आरजेएस एसोसिएशन की ओर से दायर दायर

याचिका पर दिए। अदालत ने कहा कि प्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का

अधिकार दिया गया है, लेकिन इस पर कुछ पाबंदिया भी हैं। इस प्रकरण की

राष्ट्रीय स्तर पर रिपोर्टिंग हुई है, जिससे न्यायपालिका की छवि पर धक्का

लगा है। इसलिए कोर्ट मामले में आंख बंद कर नहीं रह सकती है। इसलिए मीडिया

से यह अपेक्षा की जाती है कि वह याचिका के निस्तारण कर इस मामले का

सनसनीखेज तौर पर प्रकाशन नहीं करें, बल्कि जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग की

जाए। जिससे न्यायपालिका की छवि धूमिल ना हो।

एसोसिएशन की ओर से

अधिवक्ता दीपक चौहान ने अदालत को बताया कि हिंडौन के तत्कालीन मजिस्ट्रेट

के खिलाफ दर्ज एफआईआर अवैधानिक है। न्यायिक अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज

करने से पहले संबंधित हाईकोर्ट के सीजे से मंजूरी लेना जरूरी होता है। इसके

बावजूद इस मामले में पुलिस ने सीजे से अनुमति नहीं ली। इसके साथ ही प्रकरण

में एससी-एसटी का मुकदमा भी नहीं बनता। इसलिए एफआईआर को रद्द किया जाए और

न्यायपालिका की छवि को देखते हुए मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जाए। इसके

जवाब में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि एसोसिएशन को इस मुद्दे पर

आपराधिक याचिका पेश करने का अधिकार नहीं है। इसलिए याचिका को खारिज किया

जाए। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने संबंधित मजिस्ट्रेट के खिलाफ

दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए अधिकारियों से जवाब तलब किया है।

गौरतलब है कि दुष्कर्म पीडिता नाबालिग ने एफआईआर में आरोप लगाए हैं कि बयान

दर्ज करने के दौरान संबंधित मजिस्ट्रेट ने चोट दिखाने की बात कहकर कपडे

खोलने के लिए कहा था।

यह ख़बर दूसरों तक पहुँचाएँ

WhatsAppFacebookX

संबंधित ख़बरें