शिक्षा मंत्रालय का बड़ा कदम: अपार आईडी की बदली प्राइवेसी पॉलिसी, जानिए छात्रों को कैसे मिलेगा फायदा

शिक्षा मंत्रालय ने ‘अपार आईडी’ की प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव किया है। अब छात्रों की यह डिजिटल आईडी पढ़ाई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नौकरी के दौरान शैक्षणिक दस्तावेजों के सत्यापन में भी इस्तेमाल की जा सकेगी। अपडेटेड नीति के मुताबिक, अधिकृत नियोक्ता छात्र की सहमति मिलने के बाद उसके डिग्री, मार्कशीट, डिप्लोमा, सर्टिफिकेट और अन्य शैक्षणिक उपलब्धियों का डिजिटल सत्यापन कर सकेंगे। अपार यानी ऑटोमेटेड पर्मानेंट एकेड्मिक एकाउंट रजिस्ट्री में छात्र का शैक्षणिक रिकॉर्ड डिजिटल रूप से सुरक्षित रहता है।
हालांकि, केवल अपार आईडी उपलब्ध होने से कोई नियोक्ता छात्र का पूरा रिकॉर्ड नहीं देख सकेगा। नियोक्ता को पहले वेरिफायर के तौर पर पंजीकरण कराना होगा। इसके बाद वह किसी विशेष दस्तावेज के सत्यापन की रिक्वेस्ट भेजेगा। छात्र को इसकी सूचना मिलेगी और वह ओटीपी या ई-साइन के जरिए मंजूरी देगा। इसके बाद ही संबंधित रिकॉर्ड नियोक्ता को दिखाई देगा। छात्र रिक्वेस्ट को मंजूर या अस्वीकार भी कर सकता है। नई व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य नौकरी के लिए जमा किए जाने वाले शैक्षणिक दस्तावेजों की प्रामाणिकता जांचना है। उम्मीदवार सीवी में जिस डिग्री या संस्थान का उल्लेख करेगा, नियोक्ता उसके डिजिटल रिकॉर्ड का सत्यापन कर सकेगा। इससे फर्जी डिग्री और प्रमाण-पत्रों की पहचान आसान होने का दावा किया जा रहा है।
सरकार की ओर से अपार आईडी बनवाने का कोई शुल्क नहीं लेने की बात कही जाती रही है। हालांकि, एमपी ऑनलाइन, साइबर कैफे या कियोस्क से इसे बनवाने और प्रिंट कराने पर करीब 150 से 200 रुपये खर्च होने की बात भी कही जाती है। यदि देशभर में तीस करोड़ युवा इस तरह की आईडी बनवाते हैं तो यह खर्च करीब 4,500 से 6,000 करोड़ रुपये तक बैठ सकता है। इस राशि का एक हिस्सा घूमकर सरकार को जाता है, जबकि इसमें निजी केंद्रों की सेवा फीस भी शामिल होती है।
अपार आईडी को लेकर डेटा की खरीद-फरोख्त के आरोप शुरु से लगते रहे हैं। हालांकि, उपलब्ध प्राइवेसी पॉलिसी में छात्रों का व्यक्तिगत डेटा कंपनियों को बेचने की अनुमति का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। नीति में थर्ड पार्टी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स के इस्तेमाल, डेटा ट्रांसफर, रिकवरी और सेवा की निरंतरता की व्यवस्था का उल्लेख है। साथ ही सहमति, एक्सेस कंट्रोल, एन्क्रिप्शन और डेटा सुरक्षा उपायों की बात कही गई है। ऐसे में बड़ा सवाल डेटा बेचने से ज्यादा यह है कि छात्रों का शैक्षणिक डेटा किन परिस्थितियों में, कितने समय तक और किन अधिकृत संस्थाओं के साथ साझा किया जा सकता है। नौकरी और शिक्षा में डिजिटल सत्यापन की सुविधा के साथ डेटा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा इस व्यवस्था की अहम कसौटी रहेंगी।





