भारत की आर्थिक कूटनीति का नया क्षितिज, न्यूजीलैंड के साथ खुले निवेश, व्यापार और वैश्विक सप्लाई चेन के नए द्वार

चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की न्यूज़ीलैंड यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की विदेश नीति का केंद्र अब बहुत विस्तारित हो गया है। आर्थिक कूटनीति, वैश्विक निवेश, तकनीकी सहयोग के साथ मुक्त व्यापार और विश्वसनीय सप्लाई चेन का निर्माण आज की जरूरत है, जिसके अनुरूप ही इन दिनों भारत की विदेशनीति कार्य करते हुए देखी जा सकती है।दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच हुई वार्ता में रक्षा के साथ ही शिक्षा, कृषि और समुद्री सुरक्षा जैसे विषयों के साथ-साथ व्यापार और निवेश को जिस प्राथमिकता से स्थान मिला, उसने यह संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में दोनों देशों के बीच परस्पर तेज आर्थिक विकास होगा।आर्थिक मामलों के विश्लेषक, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो. मनोज पूनिया इस यात्रा को लेकर कहते हैं, “प्रधानमंत्री मोदी की न्यूज़ीलैंड यात्रा इसी परिवर्तन का प्रत्यक्ष उदाहरण है। चार दशक बाद हुई इस यात्रा में दोनों देशों ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी तक उन्नत किया और वर्ष 2030 तक सहयोग का विस्तृत रोडमैप तैयार किया। इसमें व्यापार, निवेश, रक्षा, शिक्षा, कृषि, नवाचार, समुद्री सहयोग और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे 18 प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है।”प्रो. पूनिया इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हैं कि भारत और न्यूज़ीलैंड के आर्थिक संबंध अभी अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंचे हैं, लेकिन उपलब्ध आंकड़े भविष्य की संभावनाओं की ओर स्पष्ट संकेत देते हैं। दिसंबर 2025 तक दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 3.95 अरब न्यूज़ीलैंड डॉलर तक पहुंच चुका था। इसमें न्यूज़ीलैंड का भारत को निर्यात 2.03 अरब न्यूज़ीलैंड डॉलर रहा। भारत आज न्यूज़ीलैंड के लिए तेजी से उभरते निर्यात बाजारों में शामिल है और आने वाले वर्षों में यह महत्व और बढ़ने की संभावना है।उन्होंने कहा, “दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक इस व्यापार को लगभग दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। निश्चित ही यह निर्णय दोनों अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक साझेदारी में बदलने की रणनीति है। आज भारत के पास राजनीतिक स्थिरता, विशाल घरेलू बाजार, प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षमता, डिजिटल अवसंरचना और कुशल मानव संसाधन का ऐसा संयोजन है, जोकि वैश्विक कंपनियों को आकर्षित कर रहा है। न्यूज़ीलैंड के साथ कृषि मूल्य शृंखला, खाद्य प्रसंस्करण, समुद्री लॉजिस्टिक्स, कोल्ड चेन और निर्यात अवसंरचना में सहयोग इस व्यापक रणनीति का हिस्सा है। यदि दोनों देश इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ते हैं, तो भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र की आपूर्ति शृंखला का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।”





