मुख्य सामग्री पर जाएँ
ब्रेकिंग
Rajasthan Panchayat Election 2026: पंचायत चुनाव का ऐलान, 4 चरणों में होगी वोटिंग, जानिए पूरा शेड्यूलमुंबई में CJP का प्रदर्शन पड़ा भारी! जेल भरो आंदोलन पर FIR, आयोजकों में हड़कंपज्ञानेश कुमार पर चले लोकतंत्र की हत्या का मुकदमा! प्रमोद तिवारी का बड़ा हमलाBJP का झंडा उतारने वाले संजयन त्रिपाठी अब साइकिल पर सवार, समाजवादी पार्टी में हुए शामिलCM Yogi का बड़ा तोहफा: 4.60 लाख छात्रों के खाते में आई छात्रवृत्ति, आपके खाते में आई क्या? चेक करेंNoida: सुपरनोवा की 43वीं मंजिल से युवक ने लगाई छलांग, मौके पर दर्दनाक मौत, सोसाइटी में हड़कंपमुंबई प्रदर्शन के बाद CJP का दिल्ली कूच का ऐलान, अभिजीत दिपके ने कही ये बड़ी बातगठबंधन में फूट! रायबरेली से डरते थे राहुल गांधी! सपा नेता का बड़ा खुलासा, अखिलेश ने दी थी धमकी

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:24 · नई दिल्ली संस्करण

एनएनआईटी, सिंचाई भवन के आसपास की 75 बीघा जमीन सरकारी के 70 साल पुराने पट्टे रद्द और दोषियों पर मुकदमा चलाने की छूट

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
एनएनआईटी, सिंचाई भवन के आसपास की 75 बीघा जमीन सरकारी के 70 साल पुराने पट्टे रद्द और दोषियों पर मुकदमा चलाने की छूट

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एमएनआईटी, सिंचाई विभाग और सरस डेयरी व उससे जुडी करीब 75 बीघा जमीन को सरकारी घोषित किया है। इसके साथ ही अदालत ने मामले में 70 साल पुराने जागीरदार के पट्टों को अमान्य करार देते हुए भूमि अधिग्रहण के पुराने अवार्ड को रद्द कर दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को दोषियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की छूट भी दी है। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह आदेश राज्य सरकार और जयपुर विकास प्राधिकरण की 34 साल पुरानी अपील को स्वीकार करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि साल 1952 में जागीर उन्मूलन अधिनियम के तहत जमीन पहले की राज्य सरकार के पास आ गई थी। ऐसे में साल 1955 में जागीरदार की ओर से जारी पट्टा कानूनी रूप से अमान्य था।

अपील में राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विज्ञान शाह ने अदालत को बताया कि साल 1952 में राजस्थान भूमि सुधार और जागीर उन्मूलन अधिनियम के तहत जागीरदारों की जमीनें राज्य सरकार के पास आ गई थी। इसके बावजूद जागीरदार ने 1955 में त्रिलोकी नाथ साहनी को 188 बीघा 8 बिस्वा जमीन का पट्टा जारी कर दिया। जिसमें खसरा नंबर 21 और 22 शामिल थे। वहीं बाद में राज्य सरकार के अधिकारियों की गलती से इस जमीन की अवाप्ति की अधिसूचना जारी हो गई। जिसका लाभ उठाते हुए साहनी ने मुआवजे के लिए दावा किया। भूमि अधिग्रहण अधिकारी से राहत नहीं मिलने पर मुआवजे के लिए मामला सिविल कोर्ट पहुंचा और रेफरेंस दायर किया गया, जिसे साल 1990 में स्वीकार कर लिया गया। राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ साल 1991 में हाईकोर्ट में अपील दायर की। इसी बीच मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2000 में प्रकरण को पुनः सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में भेज दिया।

यह ख़बर दूसरों तक पहुँचाएँ

WhatsAppFacebookX

संबंधित ख़बरें