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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 5:29 · नई दिल्ली संस्करण

इतिहास के पन्नों में 27 फरवरीः चंद्रशेखर आजाद का नाम, याद करता है हिन्दुस्तान

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन

देश-दुनिया

के इतिहास में 27 फरवरी की तारीख तमाम अहम वजह से दर्ज है। यह तारीख

क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की स्मृतियों के रूप में भारतीय स्वतंत्रता

संग्राम के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज दै। चंद्रशेखर आजाद का

जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर

हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की आजादी की लड़ाई के लिए कुर्बान कर

दिया। चंद्रशेखर बेहद कम्र उम्र में देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा बने

थे। जब सन् 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने अपना आंदोलन वापस

ले लिया तो आजाद का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। इसके बाद वे पंडित राम

प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल और योगेश चन्द्र चटर्जी के 1924 में

गठित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए।

इस एसोसिएशन के

साथ जुड़ने के बाद चंद्रशेखर ने रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी

कांड (1925) में पहली बार सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। इसके बाद चंद्रशेखर

ने 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर एसपी सॉन्डर्स को गोली मारकर

लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया। इन सफल घटनाओं के बाद उन्होंने

अंग्रेजों के खजाने को लूट कर संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन

जुटाना शुरू किया।

चंद्रशेखर को 'आजाद' नाम एक खास वजह से

मिला। चंद्रशेखर जब 15 साल के थे तब उन्हें किसी केस में एक जज के सामने

पेश किया गया। वहां पर जब जज ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने ने कहा, 'मेरा

नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल है'। जज ये सुनने

के बाद भड़क गए और चंद्रशेखर को 15 कोड़ों की सजा सुनाई, यहीं से उनका नाम

आजाद पड़ गया। चंद्रशेखर पूरी जिंदगी अपने आप को आजाद रखना चाहते थे।

अंग्रेजों

से लड़ाई करने के लिए चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में

सुखदेव और अपने एक अन्य साथियों के साथ बैठकर आगामी योजना बना रहे थे। इस

बात की जानकारी अंग्रेजों को मिल गई। उन्होंने एक पल भी गंवाए हमला कर

दिया। आजाद ने अपने साथियों को वहां से भगा दिया और अकेले अंग्रेजों से

लोहा लेने लगे। इस लड़ाई में पुलिस की गोलियों से आजाद बुरी तरह घायल हो

गए। वे सैकड़ों पुलिस वालों के सामने 20 मिनट तक लड़ते रहे। उन्होंने

संकल्प लिया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी

दे सकेगी। इसीलिए अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी पिस्तौल की आखिरी

गोली खुद को मार ली और मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी। इस तरह

आजाद ने ताउम्र अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार नहीं होने का अपना वादा पूरा

किया और 27 फरवरी, 1931 की तारीख हमेशा के लिए स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास

में दर्ज हो गई।

महत्वपूर्ण घटनाचक्र

1879ः आर्टिफिशियल स्वीटनर सैकरीन की खोज रूसी रसायनशास्त्री कॉन्सटैंटिन फालबर्ग ने की।

1932ः ब्रिटिश भौतिकशास्त्री जेम्स चैडविक ने न्यूट्रॉन की खोज की।

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