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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:32 · नई दिल्ली संस्करण

धमतरी-विंध्यवासिनी मां का 35 साल बाद चोला हटा, आई नए स्वरूप में

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन

धमतरी, ।शहर की आराध्य देवी मां विंध्यवासिनी मंदिर अब नए स्वरूप

में भक्तों को दर्शन दे रही हैं। लगभग 35 साल बाद मां का चोला हट गया है।

अब वह लगभग मूल स्वरूप में हैं। नियमित श्रृंगार की जा रही है। हटे हुए

चोला को विधिवत पूजा अर्चना कर गंगा में विसर्जित किया जाएगा। माता दर्शन

पूूजन के लिए भक्त पहुंच रहे हैं।

मां विंध्यवासिनी का

चमत्कार और प्रसिद्धि किसी से छुपी नहीं है। भक्तों पर विशेष कृपा बरसाने

वाली मां अब नए स्वरूप में दिख रही हैं। रविवार की सुबह अचानक मां का चोला

हटा और वह मूल रूप में आ गई। इसके बाद तुरंत समस्त पुजारियों ने पट बंद कर

माता का श्रृंगार करना शुरू किया। अब मां नए स्वरूप में भक्तों को दर्शन दे

रही हैं।

35 साल बाद हटा 25 किलो का चोला

पुजारी

समिति के अध्यक्ष पंडित अश्वनी दुबे ने बताया कि रविवार 12 मई की सुबह

लगभग 10 बजे अचानक सूचना मिली की मां का चोला हट गया है। तुरंत पहुंचे सभी

पुजारी इकट्ठे हुए और पट बंद कर लगभग 6 घंटे तक मां के चोला को और अच्छे से

ठीक कर उसे नए स्वरूप में लाया गया। बताया गया सप्ताह में दो से तीन दिन

सिंदूर और घी से मां का लेप और श्रृंगार किया जाता है। यह सिंदूर धीरे-धीरे

चढ़ता जाता है। लगभग 35 साल बाद रविवार को अचानक चोला हट गया। इसके बाद से

जैसे पहले की भांति ही मां का श्रृंगार और सिंदूर लगाया जा रहा है। अश्वनी

दुबे ने बताया कि इस मंदिर की पूजा की परंपरा पिछले सात पीढ़ियों से चली आ

रही है जो अब तक अनवरत जारी है।

मंदिर का इतिहास

माता

की उत्पत्ति के संबंध में मार्कण्डेय पुराण देवीमाहा में उल्लेख है। मंदिर

के संदर्भ में दो जनश्रुति प्रचलित है। पहली जनश्रुति के अनुसार मूर्ति की

उत्पत्ति धमतरी के गोड़ नरेश धुरूवा के काल की है और दूसरी है कि कांकेर

नरेश के शासनकाल, उनके मांडलिक के समय की है। जहां देवी का मंदिर है, वहां

कभी घना जंगल था। जंगल भ्रमण के दौरान राजा के घोड़ों ने एक स्थान से आगे

बढ़ना छोड़ दिया। खोजबीन करने पर राजा को एक छोटे पत्थर के दोनों तरफ जंगली

बिल्लियां बैठी दिखाई दीं, जो अत्यंत डरावनी थीं। राजा के आदेश पर पत्थर

को निकालने का प्रयास किया गया, लेकिन पत्थर बाहर आने के बजाय वहां से जल

की धारा फूट पड़ी। इसके बाद राजा को स्वप्न में देवी ने कहा कि उन्हें वहां

से निकालने का प्रयास व्यर्थ है। उसी स्थान पर पूजा-अर्चना की जाए। राजा

ने वहीं पर देवी की स्थापना करवाई। कालांतर में इसे मंदिर का स्वरूप प्रदान

किया गया। प्रतिष्ठा के बाद देवी की मूर्ति स्वयं ऊपर उठी और आज की स्थिति

में आई। पहले निर्मित द्वार से सीधे देवी के दर्शन होते थे। उस समय मूर्ति

पूर्ण रूप से बाहर नहीं आई थी, किंतु जब पूर्ण रूप से मूर्ति बाहर आई तो

चेहरा द्वार के बिल्कुल सामने नहीं आ पाया, थोड़ा तिरछा रह गया।

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