यूके में रथ यात्रा का भव्य आयोजन: 1,000 से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति, भारतीय डिप्टी हाई कमिश्नर ने निभाई 'छेरा पहाड़ा' की परंपरा

“रथ यात्रा बनी वैश्विक उत्सव : जब भगवान जगन्नाथ स्वयं पहुंचे विदेश में भक्तों के बीच”
नई दिल्ली/लंदन, 30 जून 2025 — भारतीय संस्कृति
और आस्था की भव्यता एक बार फिर यूके की धरती पर देखने को मिली जब रथ यात्रा उत्सव
के अवसर पर लंदन के हाइड पार्क क्षेत्र में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में
भगवान जगन्नाथ की शोभायात्रा निकाली गई। इस शुभ अवसर पर भारतीय डिप्टी हाई कमिश्नर श्री सुजीत घोष एवं अन्य ने पारंपरिक 'छेरा पहाड़ा' अनुष्ठान को
निभाकर इस ऐतिहासिक रस्म को जीवन्त किया। यह वही परंपरा है जिसे पुरी में गजपति
महाराज द्वारा स्वयं भगवान के रथ की सफाई कर के निभाया जाता है . यह उस दर्शन को
प्रस्तुत करता है जिसमें राजा भी भगवान के चरणों में सेवक बन जाता है।
भक्ति, भव्यता और भिन्न संस्कृतियों का संगम बन
चुका यह उत्सव अब केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह विश्व मंच पर भारतीय मूल्यों और परंपराओं की जीवंत
उपस्थिति बन चुका है।
रथ यात्रा क्यों मनाई जाती है?
रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ, उनके भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा की एक वार्षिक यात्रा है जिसमें तीनों देवता पुरी के
श्रीमंदिर से बाहर निकलकर अपने मौसी के घर ‘गुंडिचा मंदिर’ तक रथों में यात्रा करते हैं। यह यात्रा बताती है कि भगवान
स्वयं अपने भक्तों के बीच आकर उन्हें दर्शन देते हैं, विशेषकर उन लोगों को जो मंदिर नहीं आ
सकते। इस उत्सव का मूल भाव है समता, सेवा और समर्पण।
रथ यात्रा का
प्रतीकात्मक अर्थ यह भी है कि भगवान किसी भौतिक सीमा में नहीं बंधते। जब वे मंदिर
से बाहर आते हैं, तब सभी वर्ग, जाति, धर्म और पंथ के लोग उन्हें निहार सकते हैं। यही कारण है कि
रथ यात्रा को सभी के लिए खुला
उत्सव माना गया है।
यह परंपरा कब से चल रही है?
रथ यात्रा की
परंपरा हज़ारों वर्षों
पुरानी है। माना जाता है
कि यह परंपरा द्वापर युग से जुड़ी हुई है, जब भगवान श्रीकृष्ण अपने जीवन के अंतिम
दिनों में पुरी आए थे। पुराणों के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने धरती से विदा ली, तब उनके अवशेषों को लेकर पुरी में
श्रीमंदिर की स्थापना हुई और वहीं से रथ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है।
ऐतिहासिक रूप से
यह उत्सव 12वीं सदी के राजा अनंतवर्मन चोडगंग
देव के काल में
औपचारिक रूप से आरंभ हुआ था। तब से यह परंपरा पुरी में निरंतर चलती आ रही है, और आज यह दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक
आयोजनों में से एक बन चुकी है।
मुख्य रूप से रथ यात्रा कहां मनाई जाती है?
रथ यात्रा का सबसे
भव्य और प्राचीन आयोजन पुरी, ओडिशा में होता है, जिसे “जगन्नाथ रथ यात्रा” कहा जाता है। यहां प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से केवल
इस दर्शन के लिए आते हैं। तीन विशाल रथों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को सजाकर
भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।
हालांकि समय के
साथ यह परंपरा भारत के अन्य राज्यों में भी फैली जैसे कि कोलकाता, अहमदाबाद, मुंबई, दिल्ली और रांची और फिर पूरे विश्व में भारतीय प्रवासी
समुदाय ने इसे अपनाया। आज अमेरिका, यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, जापान और मलेशिया जैसे देशों में भी रथ यात्रा बड़ी श्रद्धा और उत्साह से
मनाई जाती है।
यूके में रथ यात्रा: भारत की संस्कृति का वैश्विक विस्तार
यूके में रथ
यात्रा का आयोजन मुख्य रूप से ISKCON (इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस) के सहयोग से होता
है, जो श्रीकृष्ण
भक्ति और वेदांत परंपरा का प्रचार-प्रसार करता है। इस वर्ष लंदन, लीसेस्टर, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और
ग्लासगो जैसे शहरों में इस आयोजन को भव्य रूप दिया गया।
लंदन की रथ यात्रा
में भाग लेने आए श्रद्धालुओं के लिए रंग-बिरंगे परिधानों में भक्तों द्वारा नृत्य, कीर्तन, प्रसाद वितरण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन किया
गया। विदेशी नागरिकों और स्थानीय ब्रिटिश जनता ने भी इसमें रुचि दिखाई और भारत की
सांस्कृतिक गहराई को सराहा।
छेरा पहाड़ा: जब राजा बनता है सेवक
इस आयोजन का सबसे
भावनात्मक और आध्यात्मिक क्षण तब आया जब भारतीय डिप्टी हाई कमिश्नर सुहास सावंत ने
रथ के चारों ओर झाड़ू लगाकर ‘छेरा पहाड़ा’ की परंपरा निभाई। यह रस्म यह संदेश देती
है कि ईश्वर के समक्ष सभी एक समान हैं चाहे वह राजा हो, सेवक हो या कोई आम जन। यह भारतीय दर्शन में विनम्रता और
सेवा का सर्वोच्च उदाहरण है।
भारतीय अध्यात्मिक परंपरा की विश्व यात्रा
रथ यात्रा केवल एक
धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की
आध्यात्मिक आत्मा का प्रतीक है जो सीमाओं को लांघकर अब वैश्विक जनमानस
का हिस्सा बन चुकी है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भक्ति और संस्कृति को कोई
राष्ट्र या धर्म सीमित नहीं कर सकता।
यूके में मनाया
गया यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि भारत की परंपराएं अब विश्व के हर कोने में अपनी अमिट छाप
छोड़ रही हैं।
"जहां भक्त, वहीं भगवान और जहां रथ यात्रा, वहीं भारत की आत्मा"।





