अल्पसंख्यक विभाग के डिजिटलीकरण के लिए 83 लाख में नियुक्त होंगे दो सलाहकार, जानिए फैसले की पूरी कहानी

सरकारी विभागों के कामकाज का डिजिटलीकरण, योजनाओं को ऑनलाइन करना और तकनीक आधारित व्यवस्था तैयार करना सामान्य तौर पर सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी मानी जाती है। इसके बावजूद महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक विकास विभाग ने सूचना-प्रौद्योगिकी और ई-गवर्नेंस से जुड़े कामों के लिए निजी सलाहकार संस्था की सेवाएं लेने का फैसला किया है। खास बात यह है कि ‘एम. एस. केपीएमजी एडवाइजरी सर्विसेज प्रा. लि.’ के दो वरिष्ठ सलाहकारों के लिए प्रति व्यक्ति 3.45 लाख रुपये मासिक मानधन मंजूर किया गया है।
दोनों सलाहकारों का कुल मासिक मानधन 6.90 लाख रुपये होगा, जबकि 12 महीने की अवधि में इस पर करीब 82.80 लाख रुपये खर्च होंगे। यह नियुक्ति 1 सितंबर 2026 से 30 अगस्त 2027 तक के लिए की गई है। इस फैसले के बाद सवाल उठ रहा है कि विभाग के डिजिटल कामों के लिए सरकारी तंत्र की मौजूदा क्षमता का इस्तेमाल करने के बजाय निजी सलाहकारों पर इतना बड़ा खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ी? अल्पसंख्यक विकास विभाग के ई-गवर्नेंस प्रोजेक्ट के लिए वर्ष 2024 में सलाहकार संस्थाओं के चयन की प्रक्रिया शुरू की गई थी। तीन संस्थाओं ने प्रस्ताव पेश किए थे, जिसके बाद उनके उम्मीदवारों के साक्षात्कार लिए गए।
चयनित उम्मीदवारों में केपीएमजी के मिलिंद चौधरी भी शामिल थे, जो 2 दिसंबर 2024 को विभाग में सलाहकार के तौर पर कार्यरत हुए थे। उन्हें नवंबर 2026 तक सेवा विस्तार भी दिया गया था। हालांकि, अब विभाग ने मौजूदा सलाहकार की सेवाएं समाप्त कर दो नए वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त करने का निर्णय लिया है। नई नियुक्ति के तहत दोनों सलाहकारों को विभाग की सूचना-प्रौद्योगिकी व्यवस्था की समीक्षा से लेकर आईटी सिस्टम के डिजाइन, क्रियान्वयन, निगरानी और उसमें सुधार तक की जिम्मेदारी दी गई है।
सलाहकारों के कार्यक्षेत्र में विभाग की विभिन्न योजनाओं का डिजिटलीकरण, आवेदन और मंजूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन करना तथा प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण यानी डीबीटी के लिए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करना शामिल है। इसके अलावा योजनाओं की निगरानी के लिए डैशबोर्ड तैयार करना, लाभार्थियों के आंकड़े जुटाना और उनका विश्लेषण करना भी उनकी जिम्मेदारी होगी। विभाग के अंतर्गत आने वाले स्कूलों, छात्रावासों, मदरसों, प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तहत संपत्तियों और अन्य बुनियादी सुविधाओं की डिजिटल निगरानी भी की जाएगी।
जीआईएस के माध्यम से संपत्तियों और विकास परियोजनाओं की मैपिंग, लाभार्थियों के पंजीकरण से लेकर डीबीटी के जरिए राशि वितरण तक की प्रक्रिया का डिजिटल प्रबंधन तथा नागरिकों की शिकायतों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करने का काम भी प्रस्तावित है। इसके अलावा विभाग के कंप्यूटर सिस्टम, वेबसाइट, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और अन्य डिजिटल सेवाओं की समीक्षा भी इन सलाहकारों के जिम्मे होगी। दो वरिष्ठ सलाहकारों के लिए मंजूर 6.90 लाख रुपये मासिक मानधन का मतलब 12 महीनों में 82.80 लाख रुपये का खर्च है। यह राशि वित्तीय वर्ष 2026-27 के ई-गवर्नेंस प्रोजेक्ट के कंप्यूटर खर्च के लिए उपलब्ध अनुदान से वहन की जाएगी। डिजिटल प्रशासन के लिए विशेषज्ञों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन जब एक ही विभाग में दो वरिष्ठ सलाहकारों पर करीब 83 लाख रुपये सालाना खर्च किए जा रहे हों, तो यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस खर्च के बदले नागरिकों को कितना प्रत्यक्ष और मापने योग्य लाभ मिलेगा। योजनाओं का डिजिटलीकरण, ऑनलाइन सेवाएं, डेटा प्रबंधन और डैशबोर्ड तैयार होने के बाद यदि इनके वास्तविक परिणामों का मूल्यांकन किया जाए और यह पता लगाया जाए कि कितने लाभार्थियों को इससे फायदा हुआ, तभी इतने बड़े मानधन पर होने वाले खर्च का औचित्य स्पष्ट हो सकेगा। साथ ही, सरकारी आईटी तंत्र की मौजूदा क्षमता और उसके उपयोग की स्थिति की समीक्षा भी इस पूरे फैसले के संदर्भ में अहम मानी जा रही है।




