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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:36 · नई दिल्ली संस्करण

हाईटेक हुए देश के जंगल! AI तकनीक करेगी वन्यजीवों की निगरानी, शिकारियों और इंसानी दखल पर लगेगा ब्रेक

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
हाईटेक हुए देश के जंगल! AI तकनीक करेगी वन्यजीवों की निगरानी, शिकारियों और इंसानी दखल पर लगेगा ब्रेक

- उदंती-सीतानदी में 70-80 फीट ऊंचे टावरों से 24 घंटे निगरानी

- स्मार्ट कैमरे पहचानेंगे वन्यजीव और संदिग्ध गतिविधियां, व्हाट्सएप पर मिलेगा तत्काल अलर्ट

गरियाबंद/रायपुर। जंगल की निगरानी अब सिर्फ गश्ती दलों और पारंपरिक कैमरों तक सीमित नहीं रहेगी। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम का ट्रायल शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में शुरू की गई यह व्यवस्था जंगल के संवेदनशील इलाकों पर चौबीसों घंटे नजर रखेगी। खास बात यह है कि सिस्टम केवल तस्वीरें रिकॉर्ड नहीं करेगा, बल्कि गतिविधियों को पहचानकर तत्काल सूचना भी देगा।

ऊंचे टावरों से दूर तक निगाह-

परियोजना के तहत 70 से 80 फीट ऊंचे टावरों पर एआई कैमरे और पीयर-टू-पीयर (P2P) वायरलेस सिस्टम लगाए जा रहे हैं। इससे दुर्गम जंगलों में भी लाइव निगरानी संभव होगी। कैमरे हाथी, बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे वन्यजीवों की पहचान करने के साथ संदिग्ध व्यक्ति और असामान्य गतिविधियों का भी पता लगाएंगे।

हाथी आबादी के करीब आया तो तुरंत सूचना-

स्मार्ट सर्विलांस का सबसे बड़ा फायदा मानव-हाथी संघर्ष रोकने में मिलने की उम्मीद है। हाथियों अथवा अन्य वन्यजीवों की आबादी की ओर गतिविधि सामने आने पर वन विभाग को तत्काल अलर्ट मिल सकेगा। इससे समय रहते वन अमला मौके पर पहुंचकर आवश्यक कार्रवाई कर सकेगा।

शिकार और लकड़ी तस्करी पर भी नजर-

सिस्टम का ट्रायल कुल्हाड़ीघाट, इंदागांव, रिसगांव, दक्षिण उदंती और पायलीखण्ड उत्तर उदंती रेंज में किया जा रहा है। ये क्षेत्र वन्यजीवों के प्रमुख आवागमन मार्ग होने के साथ अवैध शिकार, लकड़ी तस्करी और अतिक्रमण की दृष्टि से संवेदनशील हैं। जंगल में पेड़ों की कटाई या संदिग्ध गतिविधि का संकेत मिलने पर संबंधित वन अधिकारियों और कर्मचारियों को **व्हाट्सएप के माध्यम से तत्काल अलर्ट भेजा जाएगा।

दुर्गम जंगलों में भी पहुंचेगा लाइव वीडियो-

पी2पी वायरलेस तकनीक से दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित एंटी-पोचिंग कैंपों और वन चौकियों को लाइव निगरानी नेटवर्क से जोड़ा जा सकेगा। सीमित मानव संसाधन के बीच यह तकनीक वन विभाग के लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ साबित हो सकती है। एक साथ कई संवेदनशील क्षेत्रों पर नजर रखने से गश्त और कार्रवाई की क्षमता बढ़ेगी।

पहले से जारी तकनीकी संरक्षण अभियान को मिलेगी गति

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में थर्मल ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग पहले से किया जा रहा है। पिछले चार वर्षों में 956 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है और 500 से अधिक तस्करों व शिकारियों की गिरफ्तारी की गई है। प्रत्येक टावर, एआई कैमरा और पी2पी कनेक्टिविटी सहित आवश्यक ढांचे पर करीब 2.5 से 3 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। यदि ट्रायल सफल रहा तो यह मॉडल मध्य भारत के अन्य संरक्षित क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। यानी आने वाले समय में जंगल की सुरक्षा में वनरक्षकों के साथ एआई भी चौबीसों घंटे पहरेदार की भूमिका निभाता नजर आएगा।

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