कोचिंग नहीं, स्किल चाहिए: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का शिक्षा व्यवस्था पर करारा प्रहार, कहा— 'कोचिंग सेंटर टैलेंट के ब्लैक होल बन गए हैं'

कोचिंग नहीं, स्किल चाहिए: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का शिक्षा व्यवस्था पर करारा प्रहार, कहा— 'कोचिंग सेंटर टैलेंट के ब्लैक होल बन गए हैं'
कोटा (राजस्थान), 12 जुलाई 2025:भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT), कोटा के चौथे दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने आज देश की शिक्षा प्रणाली, कोचिंग कल्चर, और डिजिटल आत्मनिर्भरता को लेकर कई तीखे सवाल उठाए और समाज को गहराई से झकझोर देने वाले संदेश दिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "कोचिंग सेंटर अब कोचिंग नहीं, बल्कि पोचिंग सेंटर बन गए हैं। यह टैलेंट को निगलने वाले ब्लैक होल हैं जो बच्चों की रचनात्मकता को सिलो (silo) में कैद कर रहे हैं।"
धनखड़ ने कहा कि भारत की युवा शक्ति का भविष्य उन कोचिंग संस्थानों के हवाले नहीं किया जा सकता जो शिक्षा को सिर्फ रैंक और नंबरों तक सीमित कर रहे हैं। “हमारे युवाओं को नंबर मशीन नहीं, विचारशील नागरिक बनाना है। जो छात्र सालों तक सिर्फ रट्टा लगाकर परीक्षा की तैयारी करते हैं, उनकी सोचने की क्षमता जड़ हो जाती है। यही कारण है कि कई बार मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ता है।”
"तकनीकी नेतृत्व ही नया देशभक्ति का मार्ग है"
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आज की दुनिया में युद्ध बंदूक और बारूद से नहीं, एल्गोरिद्म और डेटा से लड़े जा रहे हैं। उन्होंने आगाह किया कि अगर भारत विदेशी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हो गया, तो उसकी संप्रभुता सेना नहीं, बल्कि सर्वर से छिन जाएगी। इस संदर्भ में उन्होंने जोर देते हुए कहा, “तकनीकी नेतृत्व ही नया देशभक्ति का मार्ग है। हमें तकनीकी मामलों में विश्व नेता बनना ही होगा।”
"कोचिंग सेंटर शिक्षा नीति की धारा के विरुद्ध हैं"
उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का हवाला देते हुए कहा कि कोचिंग सेंटर उसकी आत्मा के खिलाफ जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य जिज्ञासा जगाना और कौशल का विकास करना है, न कि "असेम्बली लाइन की फैक्ट्री" की तरह छात्र तैयार करना। “रट्टा आधारित प्रणाली ने जीवंत दिमागों को मेकेनिकल स्मृति-कोष बना दिया है। डिग्री मिलती है, लेकिन गहराई नहीं होती। याददाश्त होती है, लेकिन समझ नहीं।”
"गुरुकुल की परंपरा से लेकर डिजिटल भविष्य तक – हमें भारतीय समाधान चाहिए"
उन्होंने भारतीय संविधान में अंकित गुरुकुल परंपरा का स्मरण करते हुए कहा कि हम "ज्ञान दान की परंपरा" में विश्वास करते आए हैं, लेकिन आज की शिक्षा प्रणाली भाषण कम और विज्ञापन अधिक बन गई है। “अखबारों और होर्डिंग्स में जो पैसा बहाया जा रहा है, वो उन अभिभावकों की गाढ़ी कमाई है जो अपने बच्चों का भविष्य संवारना चाहते हैं। लेकिन यह पैसा सिर्फ भ्रमजाल बन रहा है।”
डिजिटल आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “एक ऐसा स्मार्ट ऐप जो ग्रामीण भारत में काम नहीं करे, वह स्मार्ट नहीं है। एक ऐसा एआई मॉडल जो स्थानीय भाषाएं न समझे, वह अधूरा है। एक ऐसा डिजिटल उपकरण जो दिव्यांगों को न जोड़े, वह अन्यायपूर्ण है।” उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे “भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए भारतीय प्रणालियाँ बनाएँ – और फिर उन्हें वैश्विक बनाएं।”
"डिजिटल आत्मनिर्भरता ही राष्ट्र निर्माण की नई चाबी है"
धनखड़ ने छात्रों को केवल अंकपत्रों के पीछे भागने के बजाय नवाचार, सोच, और सेवा भाव की ओर प्रेरित किया। “आपके अंकपत्र नहीं, आपका दृष्टिकोण आपको परिभाषित करेगा। जब आप प्रतिस्पर्धा की दुनिया में उतरेंगे, तब ज्ञान और सोच ही आपकी असली पहचान बनेंगे।”
उन्होंने कहा कि भारत अब सिर्फ उपयोगकर्ता राष्ट्र नहीं बन सकता, “हमें डिजिटल दुनिया के निर्माता बनना है – कोडर, एआई इंजीनियर, डेटा वैज्ञानिक और नवाचारकर्ता आज के राष्ट्रनिर्माता हैं। यह समय है जब भारत अपनी तकनीक का निर्यात करे, न कि उधार की तकनीक पर निर्भर रहे।”
"हमारी शिक्षा को 'सामूहिक पंक्ति संस्कृति' से मुक्त करना होगा"
उपराष्ट्रपति ने तीव्र शब्दों में शिक्षा को फैक्ट्री मॉडल से मुक्त करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह “रट्टा संस्कृति, मेमोरी तो देती है लेकिन मीनिंग नहीं। डिग्री देती है, लेकिन उद्देश्य नहीं।” यह चेतावनी सिर्फ शिक्षा मंत्रालय या संस्थानों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है – एक ऐसा समाज जो नंबरों को ही सफलता मानता है, न कि सोचने की क्षमता को।





