आपातकाल की काली यादों पर शशि थरूर का प्रहार: कांग्रेस नेता ने संजय गांधी की भूमिका को याद दिलाया, कहा— “1975 में देखा गया था आज़ादी का गला घोंटना”

आपातकाल की काली यादों पर शशि थरूर का प्रहार: कांग्रेस नेता ने संजय गांधी की भूमिका को याद दिलाया, कहा— “1975 में देखा गया था आज़ादी का गला घोंटना”
नई दिल्ली। आपातकाल की 50वीं बरसी पर जहां भारतीय जनता पार्टी इसे ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मना रही है, वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. शशि थरूर ने भी इस विषय पर चुप्पी तोड़ते हुए 1975 के आपातकाल की तीखी आलोचना की है। उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया और साफ कहा कि “कैसे आज़ादी छीनी जाती है, यह देश ने 1975 में देखा था।”
डॉ. थरूर ने संजय गांधी की भूमिका को याद दिलाते हुए इशारों-इशारों में कांग्रेस नेतृत्व की उस सोच की ओर संकेत किया, जिसने लोकतांत्रिक संस्थाओं का गला घोंटने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने कहा कि भारत आज 1975 का भारत नहीं है— जनता अब अधिक सजग है और संविधान की गरिमा व स्वतंत्रता के महत्व को भली-भांति समझती है।
यह बयान उस समय आया है जब भारतीय जनता पार्टी पूरे देश में आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर जागरूकता अभियान चला रही है। भाजपा इसे "संविधान हत्या दिवस" के रूप में जन-जन तक पहुंचा रही है, ताकि देश की युवा पीढ़ी यह जान सके कि जो आज संविधान के कथित रक्षक बने बैठे हैं, उन्होंने ही 25 जून 1975 को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के माध्यम से आपातकाल लगाकर संविधान की आत्मा को कुचल डाला था।
आपातकाल के दौरान न सिर्फ लाखों लोगों को जेल में डाला गया, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता पर ताले जड़ दिए गए, न्यायपालिका को झुकने पर मजबूर किया गया, और विरोध करने वालों पर बर्बर अत्याचार किए गए। संजय गांधी की तानाशाही भूमिका, जबरन नसबंदी अभियान, झुग्गी झोपड़ियों का उन्मूलन और राजनैतिक विरोधियों पर कहर— ये सब कांग्रेस शासन की ‘लोकतांत्रिक हत्या’ का गवाह बने।
डॉ. शशि थरूर का यह बयान अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कांग्रेस के भीतर से ही निकली वह आवाज है जो सत्य का सामना करने का साहस रखती है। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने खुलकर असहमति व्यक्त की हो— इससे पहले भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुछ नीतियों की प्रशंसा कर चुके हैं, विशेषकर विदेश नीति और वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका को लेकर।
भाजपा नेताओं का कहना है कि आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर यह आवश्यक है कि देश की नई पीढ़ी को बताया जाए कि "लोकतंत्र का चीरहरण" किसने किया था और आज संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का दम भरने वाले उस समय कहां खड़े थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संसद में कहा था कि "आपातकाल न भूला जा सकता है, न माफ किया जा सकता है।"
आज जब भारत वैश्विक मंच पर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का अग्रदूत बन रहा है, तब यह भी जरूरी है कि देश अपनी ऐतिहासिक भूलों से सबक ले। डॉ. शशि थरूर जैसे नेताओं का सत्य बोलना इस बात का संकेत है कि अब कांग्रेस को अपने अतीत का सामना करना ही होगा।
आपातकाल की यह कड़वी याद हमें यही सिखाती है कि संविधान की रक्षा सिर्फ नारे लगाने से नहीं होती, बल्कि उसका सम्मान और पालन करके होती है। भारत की जनता अब धोखे में नहीं आने वाली और अब हर कोई यह जान रहा है कि कौन था ‘संविधान हत्यारा’ और कौन है उसका सच्चा रक्षक।





