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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 6:27 · नई दिल्ली संस्करण

राज्यसभा : भाषण का अंश हटाए जाने से खड़गे नाराज, वित्त मंत्री बोलीं-सभापति का है यह अधिकार

राष्ट्रीय सागर डेस्क4 मिनट का पठन
राज्यसभा : भाषण का अंश हटाए जाने से खड़गे नाराज, वित्त मंत्री बोलीं-सभापति का है यह अधिकार

नई दिल्ली। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को कहा कि सदन में उनके द्वारा दिए गए भाषण का एक हिस्सा राज्यसभा की वेबसाइट से हटा दिया गया है। इस पर उन्होंने आपत्ति जताई और कहा कि उन्होंने सभी बातें नियमों के दायरे में रहकर कर कही थीं। जवाब में सभापति ने कहा कि वे इस विषय को देखेंगे।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि हटाए गए अंशों को बहाल किया जाए। इस पर सदन में मौजूद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह निर्णय सभापति का होता है और सभापति ने यदि अपने विवेक से नियमों के आधार पर निर्णय लिया है तो ऐसे में नेता प्रतिपक्ष को ऐसी मांग नहीं करनी चाहिए।

खड़गे का कहना था कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सदन में दिए गए उनके भाषण का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी उचित कारण के हटा दिया गया है। उन्होंने जब राज्यसभा की वेबसाइट देखी तो उन्हें यहां अपने भाषण के ये अंश नहीं मिले।

खड़गे ने सदन में आपत्ति जताते हुए कहा कि जिन अंशों को रिकॉर्ड से बाहर किया गया है, उनमें मुख्य रूप से वे हिस्से शामिल हैं जहां उन्होंने वर्तमान सरकार के कार्यकाल में संसदीय कामकाज की स्थिति पर तथ्य आधारित टिप्पणियां की थीं और कुछ नीतियों पर प्रधानमंत्री की आलोचना की थी।

उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष होने के नाते यह उनका दायित्व है कि वे उन नीतियों पर सवाल उठाएं जो उन्हें लगता है कि देश और जनमानस पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। मेरा संसदीय जीवन पांच दशक से अधिक का रहा है।

विधायक और सांसद के रूप में लंबे अनुभव के दौरान मैंने सदन की गरिमा, नियमों और परंपराओं का हमेशा सम्मान किया है। मैं भली-भांति जानता हूं कि किन परिस्थितियों में किन शब्दों को रिकॉर्ड से हटाया जा सकता है। इसलिए पूरे विश्वास के साथ कह रहा हूं कि मेरे भाषण में कोई भी असंसदीय या मानहानिकारक शब्द नहीं था।

उन्होंने कहा कि अंश हटाने के लिए नियम 261 का प्रयोग केवल विशिष्ट और सीमित परिस्थितियों में किया जा सकता है। मेरे वक्तव्य में ऐसा कुछ भी नहीं था जो इस नियम के उल्लंघन की श्रेणी में आए।

मेरी सभी टिप्पणियां चर्चा के विषय से संबंधित थीं और धन्यवाद प्रस्ताव के दायरे में पूरी तरह आती थीं। इसके अतिरिक्त, आर्टिकल 105 के तहत सांसदों को सदन के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में भाषण के बड़े हिस्से को हटाया जाना न केवल संसदीय परंपराओं पर प्रश्न खड़ा करता है, बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भावना के भी प्रतिकूल है।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभापति से कहा, "मैं आपसे विनम्र आग्रह करता हूं कि हटाए गए अंशों पर पुनर्विचार किया जाए और उन्हें रिकॉर्ड में बहाल किया जाए। यदि मुझे सदन के भीतर न्याय नहीं मिलता, तो मैं जनता के बीच अपने भाषण का अनरिकॉर्डेड संस्करण साझा करने के लिए बाध्य होऊंगा। उस स्थिति में इसे नियमों के उल्लंघन के रूप में न देखा जाए, क्योंकि मेरा उद्देश्य केवल अपनी बात को पारदर्शिता के साथ देश के सामने रखना है।"

इससे असहमति जताते हुए सभापति सीपी राधाकृष्णन ने कहा, "यह सही नहीं है। मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूं। यह बिल्कुल उचित नहीं है।

यह लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है। आप कैसे पीठ को निर्देश दे सकते हैं? यह सरासर गलत है।"

इस पर खड़गे का कहना है कि वह केवल अपनी आपत्ति और अपनी पीड़ा रख रहे हैं। एक सदस्य के रूप में यह उनका अधिकार है कि यदि उनके भाषण का बड़ा हिस्सा हटाया गया है तो वह उसका कारण जानना चाहते हैं। सदन में ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नेता प्रतिपक्ष के वक्तव्य पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सभापति से कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने आपके निर्णय पर सवाल खड़ा किया है।

नियम 261 का उल्लेख करते हुए वित्त मंत्री ने कहा, "नियम 261 के अनुसार, यदि सभापति की यह राय हो कि बहस के दौरान कोई शब्द या शब्दावली मानहानिकारक, अशोभनीय, असंसदीय या गरिमा के प्रतिकूल है, तो सभापति अपने विवेक से ऐसे शब्दों को कार्यवाही से हटाने का आदेश दे सकते हैं। यह स्पष्ट रूप से सभापति का विशेषाधिकार और विवेकाधिकार है।''

वित्त मंत्री ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष यह संकेत देने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके अपने आकलन में उन्होंने कुछ भी अनुचित या गरिमा के विरुद्ध नहीं कहा। लेकिन निर्णय उनका नहीं, निर्णय पीठ का है। सभापति ने अपने अधिकार और विवेक का प्रयोग करते हुए निर्णय लिया है। उस निर्णय पर पुनः प्रश्न उठाना नेता प्रतिपक्ष जैसे पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही नियमों से चलती है और उन नियमों के तहत अंतिम निर्णय पीठ का होता है। इसलिए मेरा मानना है कि पीठ के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए और सदन की गरिमा बनाए रखी जानी चाहिए।

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