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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:51 · नई दिल्ली संस्करण

निशिकांत दुबे ने 1978 में इंदिरा गांधी को निकाले जाने का किया जिक्र, मूल प्रस्ताव के जरिए राहुल गांधी की सदस्यता खत्म करने की मांग

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
निशिकांत दुबे ने 1978 में इंदिरा गांधी को निकाले जाने का किया जिक्र, मूल प्रस्ताव के जरिए राहुल गांधी की सदस्यता खत्म करने की मांग

नई दिल्ली। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ मूल प्रस्ताव लाने के फैसले के साथ 1978 की ऐतिहासिक संसदीय कार्रवाई का हवाला देकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है।

निशिकांत दुबे ने दिसंबर 1978 की उस घटना से तुलना की, जब इसी तरह के प्रस्ताव के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई थी और उन्हें जेल भी भेजा गया था।

संसदीय प्रक्रिया में मूल प्रस्ताव एक स्वतंत्र और स्पष्ट प्रस्ताव होता है, जिसे सदन के सामने निर्णय या राय व्यक्त करने के लिए रखा जाता है। इसे स्वीकार कर सदन में पेश किए जाने के बाद इस पर बहस होती है और अंत में मतदान कराया जाता है।

निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी पर विशेषाधिकार हनन का आरोप लगाते हुए उनके लोकसभा सदस्य पद को रद्द करने और भविष्य के चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की मांग की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट में 1978 के संसदीय रिकॉर्ड के अंश भी दिखाए और लिखा कि इसी तरह के प्रस्ताव के आधार पर इंदिरा गांधी की सदस्यता समाप्त हुई थी और उन्हें जेल भेजा गया था।

1978 का मामला 22 नवंबर 1978 को लोकसभा में पेश किए गए मूल प्रस्ताव से जुड़ा था। यह प्रस्ताव विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट के आधार पर लाया गया था, जिसमें इंदिरा गांधी को सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन का दोषी पाया गया था।

आरोप 1975 के आपातकाल के दौरान की गई कार्रवाई से जुड़े थे, जिनमें उनके पुत्र संजय गांधी की मारुति परियोजना की जांच कर रहे चार सरकारी अधिकारियों को कथित रूप से बाधित करने, डराने-धमकाने और झूठे मामले दर्ज कराने का उल्लेख था।

लंबी बहस के बाद 19 दिसंबर 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा लाया गया प्रस्ताव पारित हुआ। इसके परिणामस्वरूप इंदिरा गांधी को लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया और उन्हें संसदीय सत्र की शेष अवधि के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया।

हालांकि, यह निष्कासन स्थायी नहीं रहा और 7 मई 1981 को सातवीं लोकसभा ने निर्णय वापस ले लिया, जब वे फिर सत्ता में लौटीं।

गुरुवार को निशिकांत दुबे ने कहा था कि उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ मूल प्रस्ताव शुरू किया है और उन पर 'राष्ट्र-विरोधी ताकतों' के साथ होने का आरोप लगाया। यह कदम लोकसभा में एक दिन पहले हुई तीखी बहस के बाद सामने आया, जब राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया था कि इस समझौते में भारत और उसके नागरिकों के हितों से समझौता किया गया है और 'भारत माता को बेच दिया गया' है।

उनके बयान पर सत्तापक्ष के सांसदों ने जोरदार विरोध किया और इसे 'असंसदीय' बताते हुए रिकॉर्ड से हटाने की मांग की।

इसके बाद भाजपा सांसदों ने विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की घोषणा की और राहुल गांधी पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाया।

कांग्रेस पार्टी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता को सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, खासकर जब देश के ऊर्जा और किसान हितों से जुड़े मुद्दे हों।

बाद में गुरुवार शाम को केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि सरकार ने फिलहाल अपना प्रस्ताव स्थगित कर दिया है, क्योंकि निजी सदस्य के रूप में निशिकांत दुबे का मूल प्रस्ताव पहले ही पेश किया जा चुका है।

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