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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 4:04 · नई दिल्ली संस्करण

Breaking: भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान और बांग्लादेश साथ मिलकर कर रहे ये नई साजिश!

राष्ट्रीय सागर डेस्क4 मिनट का पठन
Breaking: भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान और बांग्लादेश साथ मिलकर कर रहे ये नई साजिश!

तीस्ता से लेकर सिंधु तक, भारत के दोनों पड़ोसी देश - पाकिस्तान और बांग्लादेश - पानी के मुद्दों को हथियार बनाकर एक जैसी कूटनीतिक रणनीति अपनाते दिख रहे हैं। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिद उद्दीन चौधरी एनी ने मांग की है कि भारत गंगा जल संधि में गारंटी की शर्त शामिल करे और तीस्ता नदी से भी पानी की आपूर्ति करे। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि अगर भारत ऐसा नहीं करता है, तो बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों का दरवाजा खटखटाएगा। गौरतलब है कि पाकिस्तान पहले भी सिंधु जल संधि को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का रुख कर चुका है। दोनों देशों की भाषा और रणनीति में साफ समानताएं दिख रही हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या पानी के मुद्दे पर भारत के खिलाफ कोई साझा मोर्चा बन रहा है।

बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिद उद्दीन चौधरी अनी ने 19 अगस्त को ढाका में एक सेमिनार के दौरान यह मांग रखी। उन्होंने कहा कि जब गंगा जल संधि का नवीनीकरण (रिन्यूअल) हो, तो उसमें एक गारंटी क्लॉज़ ज़रूर शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि यह क्लॉज़ 1977 की संधि में मौजूद था, लेकिन 1996 में शेख हसीना सरकार के दौरान हुई 30 साल की संधि में इसे हटा दिया गया था। मौजूदा संधि दिसंबर 2026 में खत्म होने वाली है और इसमें कोई गारंटी क्लॉज़ नहीं है। मंत्री ने इसे बांग्लादेश का अधिकार बताया और कहा कि उचित समझौते के बिना आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि बांग्लादेश तीस्ता मुद्दे पर भारत के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहता, लेकिन उन्होंने बताया कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान फाइल की समीक्षा कर रहे हैं और तीस्ता प्रोजेक्ट को लागू करेंगे—चाहे भारत के साथ मिलकर या किसी अलग ढांचे के तहत।

उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि ज़रूरत पड़ने पर बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख करेगा और प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान अगले महीने संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाएंगे। गारंटी क्लॉज़ का मतलब है कि पानी की कमी वाले मौसम में भी, जब फरक्का बैराज में पानी का स्तर बहुत कम हो जाता है, तब भी बांग्लादेश को पानी का कम से कम तय कोटा मिलना चाहिए। 1996 की संधि के तहत, अगर फरक्का बैराज में पानी का बहाव 70,000 क्यूसेक से कम हो जाता है, तो उपलब्ध पानी को दोनों देशों के बीच बराबर-बराबर बांटा जाता है। 11 मार्च से 10 मई के बीच का समय सबसे अहम माना जाता है, क्योंकि इस दौरान पानी का स्तर सबसे कम हो जाता है। दोनों देशों में खेती का काम जारी रखने के लिए इस दौरान 10-10 दिन के बारी-बारी वाले रोटेशन साइकल तय किए गए थे। मंत्री की मांग है कि पानी की उपलब्धता कितनी भी कम क्यों न हो जाए, पानी के कम बहाव वाले इन समयों में बांग्लादेश के लिए पानी का कम से कम तय हिस्सा मिलना चाहिए।

बांग्लादेश ने जून 2025 में UNECE वॉटर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए और इस फ्रेमवर्क में शामिल होने वाला भारतीय उपमहाद्वीप का पहला देश बन गया। यूनाइटेड नेशंस इकोनॉमिक कमीशन फॉर यूरोप के सहयोग से चलने वाला यह कन्वेंशन एक तकनीकी और सहयोगी मंच के तौर पर काम करता है, जो सदस्य देशों को संयुक्त संस्थानों, तकनीकी टीमों और वित्तीय सहायता तक पहुँच प्रदान करता है। हालाँकि, यह कोई ट्रिब्यूनल नहीं है और चूँकि भारत ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए भारत पर इसका कोई बाध्यकारी अधिकार नहीं है। फिर भी, बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपनी माँगों को वैध बनाने के लिए इसे एक संस्थागत आधार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

इससे पहले अप्रैल 2026 में, पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने के मामले को लेकर UN सुरक्षा परिषद का रुख किया था। इस्लामाबाद ने इसे क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बताया था, हालांकि वहां इस मुद्दे पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। अब, बांग्लादेश भी पानी से जुड़े विवादों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की बात करके लगभग वैसी ही रणनीति अपनाता दिख रहा है। इसके अलावा, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सहयोग और तालमेल लगातार बढ़ रहा है। हालांकि दोनों देशों के बीच अभी तक कोई औपचारिक संयुक्त राजनयिक मोर्चा नहीं बना है, लेकिन उनके बयानों और तौर-तरीकों में दिख रही समानताएं ऐसी स्थिति की ओर इशारा करती हैं जिस पर भारत को ध्यान देने की जरूरत है।

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