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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:17 · नई दिल्ली संस्करण

जन्माष्टमी 2026: 15 साल बाद रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का दुर्लभ संयोग, जानें पूजा विधि और मुहूर्त

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
जन्माष्टमी 2026: 15 साल बाद रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का दुर्लभ संयोग, जानें पूजा विधि और मुहूर्त

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी। इस वर्ष 15 साल बाद जन्माष्टमी पर ऐसा विशेष संयोग बन रहा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में मनाया मनाई जाएगी । इस संदर्भ ज्योतिष गुरु डॉ अशोक शास्त्री ने बताया कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था । 15 वर्ष पश्चात् इस जन्माष्टमी पर भी इसी तरह का संयोग बन रहा है।

ज्योतिष गुरु डॉ. अशोक शास्त्री के अनुसार कई बार जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि तो रहती है, लेकिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग नहीं बनता। इस बार दोनों एक ही दिन मिल रहे हैं। यही वजह है कि इस जन्माष्टमी को विशेष माना जा रहा है। रामानंदी संप्रदाय में जन्मोत्सव के लिए रोहिणी नक्षत्र को विशेष महत्व दिया जाता है। इस बार वैष्णव और रामानंदी समेत सभी प्रमुख संप्रदायों में 4 सितंबर को ही जन्माष्टमी मनाई जाएगी।

डॉ . अशोक शास्त्री के अनुसार जन्माष्टमी की अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का एक साथ होना विशेष फलदायी माना जाता है। कई वर्षों में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर वृष राशि में चंद्रमा तो रहता है, लेकिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग नहीं बन पाता। इस बार सभी प्रमुख ज्योतिषीय तत्व एक साथ आ रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं में भी ऐसे संयोग में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

डॉ. अशोक शास्त्री ने बताया कि जन्माष्टमी के दिन जातकों को प्रातः काल स्नान करके भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप ( लड़्डुगोपाल ) की पूजा का संकल्प ले , उपवास रखें और मध्य रात्रि , निशीथ काल में पूजन करे , बाल रूप में भगवान का पंचामृत से अभिषेक, नए वस्त्र और आभूषण पहनकर पालने में विराजमान करना , माखन - मिश्री और पंजीरी , फल, मिष्ठान्न का नैवेद्य अर्पित करना तथा आरती करना हमारी प्रमुख परंपराओं में शामिल हैं ।

मंदिरों में इस दिन कृष्ण जन्म की झांकी , महाभिषेक, भजन कीर्तन और विशेष आरती का आयोजन किया जाता हैं । डॉ. शास्त्री के मुताबिक़ भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव का मध्य रात्रि 11:56 से 12:41 बजे तक महाभिषेक, पूजन एवं आरती का श्रेष्ठ मुहूर्त है । अगले दिन 5 सितंबर नन्दोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता हैं ।

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