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ब्रिटिश संसद की रिपोर्ट में भारत पर लगा अंतरराष्ट्रीय दमन का आरोप: गंभीर साक्ष्यों का दावा

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
ब्रिटिश संसद की रिपोर्ट में भारत पर लगा अंतरराष्ट्रीय दमन का आरोप: गंभीर साक्ष्यों का दावा

ब्रिटिश संसद की रिपोर्ट में भारत पर लगा अंतरराष्ट्रीय दमन का आरोप: गंभीर साक्ष्यों का दावा

लंदन / नई दिल्ली, 31 जुलाई 2025

ब्रिटेन की संसद की एक संयुक्त मानवाधिकार समिति (JCHR) ने एक विस्फोटक रिपोर्ट में भारत समेत 12 देशों पर ब्रिटेन की धरती पर 'अंतरराष्ट्रीय दमन' (Transnational Repression - TNR) चलाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। यह रिपोर्ट ‘ब्रिटेन में अंतरराष्ट्रीय दमन’ शीर्षक से जारी की गई है, जिसमें कहा गया है कि कई विदेशी सरकारें अब ब्रिटेन में रहने वाले अपने आलोचकों, प्रवासियों और निर्वासित समुदायों को चुप कराने, धमकाने और डराने की योजनाबद्ध कोशिशें कर रही हैं।

समिति ने कहा कि उसे "विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य" प्राप्त हुए हैं कि भारत, चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान, सऊदी अरब, तुर्किये, यूएई समेत कुल 12 देश ब्रिटेन में सक्रिय रूप से TNR गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। समिति के अनुसार इन गतिविधियों का सीधा असर ब्रिटेन में रहने वाले लोगों की व्यक्तिगत सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उनके सामाजिक जीवन पर पड़ रहा है। पीड़ितों में कई ऐसे हैं जो लगातार निगरानी, धमकी और डिजिटल उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं, जिससे उनके मन में भय और असुरक्षा की भावना घर कर गई है।

रिपोर्ट में विशेष रूप से भारत के संदर्भ में ‘Sikhs For Justice’ जैसे खालिस्तान समर्थक संगठनों की चर्चा की गई है, जिन्हें भारत सरकार आतंकवाद और अलगाववाद से जोड़कर 'गैरकानूनी संगठन' घोषित कर चुकी है। ब्रिटेन में इन संगठनों की गतिविधियों के कारण भारत की खुफिया एजेंसियों पर आरोप लगाए गए हैं कि वे इन व्यक्तियों की गतिविधियों पर नजर रखने और दबाव बनाने की कोशिश कर रही हैं। हालाँकि, समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी जांच किसी विशेष सरकार की नीति पर सीधे टिप्पणी नहीं करती, बल्कि यह नागरिक अधिकारों के उल्लंघन की दृष्टि से है।

रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन की सुरक्षा एजेंसी MI5 ने 2022 के बाद से इस प्रकार के मामलों की जांच में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है, जो बताता है कि यह खतरा अब केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और तत्काल है। समिति ने ब्रिटिश सरकार से इन देशों की गतिविधियों पर कठोर नजर रखने, पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के उल्लंघन पर स्पष्ट राजनयिक प्रतिक्रिया देने की मांग की है।

अब तक भारत सरकार की ओर से इस गंभीर रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। भारत पारंपरिक रूप से विदेशी रिपोर्टों पर सीधी प्रतिक्रिया देने से बचता रहा है, विशेषकर तब जब उसमें देश की आंतरिक सुरक्षा नीति या आतंकवाद विरोधी प्रयासों पर प्रश्न उठाए जाएँ। लेकिन इस बार मामला उस ब्रिटिश संसदीय समिति का है जो विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से मिलकर बनी है और जिसकी रिपोर्ट संसद में औपचारिक रूप से दर्ज की गई है। ऐसे में भारत की चुप्पी को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक रणनीतिक असहजता के रूप में देखा जा रहा है।

यह रिपोर्ट ऐसे समय पर आई है जब भारत वैश्विक मंच पर अपने ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यह भी सत्य है कि भारत की सुरक्षा एजेंसियों को खालिस्तान जैसे खतरों से जूझना पड़ रहा है, जिनके तार कई बार विदेशों से जुड़े पाए गए हैं। ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि भारत स्पष्टता के साथ अपना पक्ष रखे और यह सुनिश्चित करे कि उसकी विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति को मानवाधिकारों के मानकों से संतुलित किया जाए।

ब्रिटेन की इस रिपोर्ट ने न केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को चुनौती दी है, बल्कि प्रवासी भारतीयों के बीच भी चिंता की लहर दौड़ा दी है।

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