बिहार चुनाव से पहले INDI गठबंधन की बेचैनी और चुनाव आयोग पर कांग्रेस की पुरानी रणनीति

बिहार चुनाव से पहले INDI गठबंधन की बेचैनी और चुनाव आयोग पर कांग्रेस की पुरानी रणनीति
नई दिल्ली / पटना 3 जुलाई 2025:बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए "Special Intensive Revision (SIR)" की प्रक्रिया शुरू की है। यह प्रक्रिया मतदाता सूची में पारदर्शिता, सटीकता और निष्पक्षता लाने की दिशा में एक अहम कदम है। लेकिन इस प्रक्रिया से जहाँ आम जनता और लोकतंत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है, वहीं कांग्रेस और INDI गठबंधन में अचानक घबराहट देखी जा रही है।
आज INDI गठबंधन के 20 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात की कोशिश की, जिसका नेतृत्व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी कर रहे थे। उन्होंने आयोग पर ‘मनमानी’ का आरोप लगाया कि आयोग ने हर दल से केवल दो प्रतिनिधियों से ही मिलने की अनुमति दी। प्रतिनिधिमंडल के कई नेता आयोग से नहीं मिल पाए और सिंघवी खुद दो घंटे प्रतीक्षा कक्ष में इंतजार करते रहे यही बात बाद में उन्होंने प्रेस के सामने उठाई।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल प्रतीक्षा कक्ष की नाराज़गी है, या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक असहजता छिपी है?
SIR प्रक्रिया: लोकतंत्र की मजबूती या विपक्ष की बेचैनी?
चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई SIR प्रक्रिया का उद्देश्य बेहद साफ है मतदाता सूची को अपडेट करना, मृत या डुप्लीकेट नामों को हटाना, और नए पात्र नागरिकों को जोड़ना। इससे फर्जी मतदान की संभावना समाप्त होगी और पारदर्शी चुनाव का मार्ग प्रशस्त होगा।
सवाल यह है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस पारदर्शिता से क्यों विचलित हैं? क्यों हर बार जब कोई सुधारात्मक कदम उठाया जाता है, तो वे उसकी मंशा पर सवाल उठाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘फिक्स वोटबैंक’ और ‘मैनेजबल काउंटिंग’ पर आधारित उनकी रणनीति को इस प्रक्रिया से झटका लग रहा है?
कांग्रेस की पुरानी आदत: हार के पहले बहाना तैयार
यह कोई पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर अंगुली उठाई हो। 2014, 2019 और अब 2024 के बाद का हर चुनाव इस बात का गवाह है कि जब भी कांग्रेस को हार की आशंका होती है, वह EVM, आयोग, सी-विजिल ऐप या वोटर लिस्ट जैसे किसी न किसी मुद्दे को विवादास्पद बना देती है।
अब जबकि SIR प्रक्रिया से मतदाता सूची में फर्जी नाम हटेंगे और सिर्फ योग्य मतदाता ही वोट डालेंगे, कांग्रेस को डर सता रहा है कि उसका "पारंपरिक गणित" गड़बड़ा जाएगा। इसलिए वह जनमत का सामना करने से पहले संस्थागत विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाकर जमीन तैयार कर रही है।
INDI गठबंधन: नेतृत्व विहीन और दृष्टि विहीन
INDI गठबंधन, जो स्वयं नेतृत्व और विचारधारा के संकट से जूझ रहा है, इस समय हर संस्थान से टकराव की राह अपना रहा है — चाहे वह राष्ट्रपति हो, सुप्रीम कोर्ट हो, संसद हो या अब चुनाव आयोग। यह रवैया न केवल अलोकतांत्रिक है बल्कि यह मतदाताओं की समझ और विवेक का भी अपमान है।
बिहार में SIR जैसे कदम से युवा मतदाताओं, प्रवासी नागरिकों और नए मतदाता वर्ग को मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर मिलेगा। लेकिन INDI गठबंधन को इससे समस्या है क्योंकि वे पुराने जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर आधारित राजनीति को ही अपने लिए अनुकूल मानते हैं।
चुनाव आयोग: लोकतंत्र की रीढ़
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसका कर्तव्य है निष्पक्ष चुनाव कराना। आयोग ने हर राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों के लिए दो-दो सदस्य निर्धारित किए, ताकि प्रक्रिया व्यवस्थित हो और संवाद प्रभावी हो सके। लेकिन कांग्रेस को यह भी मंज़ूर नहीं। वह चाहती है कि वह नियमों से ऊपर रहे चाहे वह संसद में हो या संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष।
चुनाव आयोग द्वारा उठाया गया SIR का कदम न केवल चुनावी सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे भारत के लोकतंत्र की नींव और भी मजबूत होगी। लेकिन जब विपक्ष इस पारदर्शिता से डरने लगे और संस्थाओं पर साजिश के आरोप लगाने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए नहीं, खुद विपक्ष के पतन का संकेत है।
कांग्रेस और INDI गठबंधन को समझना होगा कि लोकतंत्र में जनादेश का सम्मान करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ सम्मानजनक संवाद बनाए रखना जरूरी है। हर बार "संविधान खतरे में है" और "लोकतंत्र दबाया जा रहा है" की टेप बजाने से सच्चाई नहीं बदलती।
अब समय है कि विपक्ष आत्मावलोकन करे सवाल उठाने से पहले अपना आधार मजबूत करे। क्योंकि जनता अब सब देखती है और जवाब भी उसी को देना है।





