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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 9:23 · नई दिल्ली संस्करण

बंगाल चुनाव परिणाम: इन चुनावी वादों और ‘एम फैक्टर’ ने किया 'दीदी का खेला', भाजपा को बंपर बढ़त

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
बंगाल चुनाव परिणाम: इन चुनावी वादों और ‘एम फैक्टर’ ने किया 'दीदी का खेला', भाजपा को बंपर बढ़त

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना के शुरुआती रुझान राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रहे हैं। अब तक के ट्रेंड में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पीछे नजर आ रही है। अगर यही रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा।

इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं रही, बल्कि रणनीति, वादों और सामाजिक समीकरणों की भी रही। भाजपा ने जहां अपने वादों के जरिए मजबूत नैरेटिव खड़ा किया, वहीं ‘एम फैक्टर’ ने चुनावी गणित को पूरी तरह प्रभावित किया।

भाजपा ने अवैध घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बनाया। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को बाहर करने का वादा खासकर सीमावर्ती इलाकों में असरदार साबित हुआ। इसे सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों से जोड़कर पेश किया गया।

महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को हर महीने आर्थिक सहायता देने जैसे वादों ने बड़ा असर डाला। केंद्र की योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने का भरोसा भी दिया गया, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग में पकड़ मजबूत हुई।

राज्य में बढ़ती हिंसा और अपराध के आरोपों को भाजपा ने जोर-शोर से उठाया। ‘सख्त कानून व्यवस्था’ और यूपी मॉडल लागू करने का वादा शहरी और मध्यम वर्ग को प्रभावित करता दिखा।

‘सिंडिकेट राज’ खत्म करने और पारदर्शिता लाने का वादा भाजपा के प्रचार का अहम हिस्सा रहा। लंबे समय से सिस्टम से नाराज वोटर्स को यह संदेश सीधा लगा।

बंद पड़े उद्योगों को चालू करने और नए निवेश लाने के वादे ने युवाओं और व्यापारिक वर्ग को आकर्षित किया। ‘सोनार बांग्ला’ का सपना इसी के साथ जोड़ा गया।

इन वादों के साथ ही, भाजपा ने इन एम फैक्टर पर भी काम किया, जिन्होंने चुनाव परिणाम को पलट दिया। करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी पारंपरिक रूप से टीएमसी के साथ रही है, लेकिन इस बार नए समीकरण बने। हूमायूं कबीर की पार्टी एजेयूपी ने इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की, जबकि ध्रुवीकरण ने भी असर डाला।

महिलाएं इस चुनाव में निर्णायक भूमिका में रहीं। टीएमसी की योजनाओं और भाजपा के सुरक्षा व सम्मान के मुद्दों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला।

बंगाल से बाहर काम करने वाले लाखों लोगों का वोट इस बार अहम रहा। रोजगार के मुद्दे और ‘सोनार बांग्ला’ का विजन इन मतदाताओं को प्रभावित करता दिखा।

उत्तर 24 परगना समेत कई इलाकों में मतुआ वोट निर्णायक रहा। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर इस समुदाय की उम्मीदें भाजपा के पक्ष में जाती दिखीं।

ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि और जुझारू राजनीति टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत रही। हालांकि इस बार भाजपा ने उन पर सीधे हमले से बचते हुए अलग रणनीति अपनाई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां, रोड शो और राष्ट्रीय मुद्दों पर फोकस ने भाजपा को नई ऊर्जा दी। उनकी लोकप्रियता ने नए वोटर्स को जोड़ने में मदद की।

कुल मिलाकर, भाजपा ने अपने वादों और सामाजिक समीकरणों को जमीन पर उतारने में बढ़त हासिल की, जबकि टीएमसी इनका प्रभावी जवाब देने में संघर्ष करती दिखी। लंबे समय से सत्ता में रहने का असर भी एंटी-इंकंबेंसी के रूप में सामने आया।

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