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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:15 · नई दिल्ली संस्करण

पुत्र के अलावा ये 8 लोग कर सकते हैं पिंडदान, जानिए गरुड़ पुराण के अनुसार किसे मिलता है पहला अधिकार

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
पुत्र के अलावा ये 8 लोग कर सकते हैं पिंडदान, जानिए गरुड़ पुराण के अनुसार किसे मिलता है पहला अधिकार

गरुड़ पुराण का मुख्य विचार यह है कि विधि-विधान से बढ़कर 'श्रद्धा' महत्वपूर्ण है। किसी भी विषम परिस्थिति में पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति और शांति का यह पवित्र कर्म अधूरा नहीं छूटना चाहिए।

गरुड़ पुराण के अनुसार, बेटे के न होने पर पोते और परपोते का मुख्य अधिकार होता है, क्योंकि उन्हें एक ही वंश का हिस्सा माना जाता है। यदि वंश में कोई पुरुष संतान न हो, तो मृतक की पत्नी को अपने पति के श्राद्ध और पिंड दान की रस्में निभाने का पूरा धार्मिक अधिकार होता है।

सनातन धर्म और गरुड़ पुराण के अनुसार, पितृ ऋण से मुक्ति पाने और पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए श्राद्ध कर्म करना अनिवार्य माना जाता है। शास्त्रों में पिता के श्राद्ध और पिंड दान के लिए सबसे बड़े बेटे को मुख्य अधिकार दिया गया है। हालाँकि, अगर बेटा मौजूद न हो, जीवित न हो या हो ही नहीं, तो गरुड़ पुराण स्पष्ट रूप से निर्देश देता है कि पूर्वजों से जुड़े ये संस्कार कभी नहीं रुकने चाहिए। शास्त्रों में अधिकार का एक निश्चित क्रम तय किया गया है ताकि परिवार या समुदाय के अन्य सदस्य भी इस पवित्र कर्तव्य को पूरा कर सकें।

अगर किसी व्यक्ति की सिर्फ़ बेटियाँ हैं, तो गरुड़ पुराण के अनुसार बेटी अपने पिता का श्राद्ध कर सकती है। इसी तरह, उसका बेटा—यानी नाती (दौहित्र)—अपने नाना-नानी के लिए ये रस्में निभाने का पूरा अधिकार रखता है। इसके अलावा, परिवार में पुरुषों की गैर-मौजूदगी में, सबसे बड़ी बहू अपने सास-ससुर के लिए पिंड दान कर सकती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, अगर मरने वाले की कोई संतान नहीं है, तो सगा भाई या भतीजा (भाई का बेटा) यह ज़िम्मेदारी निभा सकता है। अगर परिवार का कोई करीबी सदस्य जीवित नहीं है, तो एक ही वंश (सगोत्र या सपिंड) के रिश्तेदार को यह अधिकार मिलता है।

अगर मृतक का कोई जीवित परिवार या खून का रिश्तेदार नहीं है, तो उनका शिष्य, गुरु या करीबी दोस्त उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर सकता है। गरुड़ पुराण में तो यहाँ तक कहा गया है कि अगर कोई रिश्तेदार या जानने वाला उपलब्ध न हो, तो एक योग्य ब्राह्मण मृतक की ओर से तर्पण कर सकता है। इसका मुख्य भाव यह है कि सच्ची श्रद्धा ही मायने रखती है, और किसी भी हाल में पूर्वजों की शांति के लिए की जाने वाली यह पवित्र रस्म अधूरी नहीं रहनी चाहिए।

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