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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 4:30 · नई दिल्ली संस्करण

सत्यनिष्ठ और योग्य पत्रकार रहे आडवाणीः अच्युतानंद मिश्र

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के सातवें उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी का जन्म पाकिस्तान के कराची में 8 नवंबर, 1927 को हुआ था। अपनी आरंभिक शिक्षा उन्होंने कराची के सेंट पैट्रिक हाई स्कूल से ग्रहण की। फिर हैदराबाद (सिंध) के डीजी नेशनल स्कूल में अध्ययन जारी रखा। भारत विभाजन की विभीषिका के बीच उनके परिवार को पाकिस्तान छोड़कर 1946 में भारत आना पड़ा था। तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गोलवलकर गुरुजी ने पाकिस्तान में रह रहे स्वयंसेवकों से कहा था कि वे भारत के उस हिस्से में आ जाएं जहां बहुसंख्यक हिन्दू रहते हैं, वहां भविष्य में कुछ भी घट सकता है। ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी के परिवार ने भी अन्य कुछ स्वयंसेवकों की तरह भारत के बहुसंख्यक हिन्दू क्षेत्र में आना ही स्वाभिमान के साथ जीवन को बनाए रखने के लिए श्रेयस्कर समझा और उनका परिवार मुंबई आकर बस गया।

मुंबई से हुई आडवाणी के पत्रकार जीवन की शुरुआत

लालकृष्ण आडवाणी ने मुंबई के लॉ कॉलेज ऑफ द बॉम्बे यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई पूरी की। मुंबई में रहते हुए ही वह संघ कार्य करते रहे और यहीं पर वे शिवराम शंकर आप्टे उपाख्य दादासाहेब आप्टे के संपर्क में आए और फिर पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को विशेषकर उनके जीवन में कष्टों और उसके निवारण के लिए आडवाणी ने अपनी कलम चलाई। उस समय अमूमन न्यूज एजेंसी की पत्रकारिता में, यह आज भी है कि कई स्टोरी नाम से नहीं जाती, वह एजेंसी के नाम से ही जारी होती है। अत: लालकृष्ण आडवाणी ने भी कई स्टोरी न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के लिए फाइल कीं। तत्कालीन समय में बापूराव लेले, रामशंकर अग्निहोत्री, नारायण राव तर्टे, बालेश्वर अग्रवाल जैसे कई मूर्धन्य पत्रकारों के साथ उन्होंने कार्य किया।

लम्बे समय तक ऑर्गेनाइजर के लिए भी किया काम

लालकृष्ण आडवाणी की पत्रकारिता जीवन को नजदीक से देख चुके माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने अपने अनुभव साझा करते हुए हिस को बताया, ''आडवाणी जी अपने समय के श्रेष्ठ पत्रकारों में रहे हैं। मैं जब पांचजन्य के लिए पत्रकारिता कर रहा था, उस समय वे अंग्रेजी समाचार पत्र ऑर्गेनाइजर के लिए पत्रकारिता कर रहे थे। जिस प्रकार कभी किसी ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से पूछा था कि आप यदि राजनीति में नहीं आते तो क्या करते? तब उन्होंने जो जवाब दिया था कि मैं राजनीति में नहीं आता तो पत्रकार होता। वैसे ही यही बात आडवाणी जी के जीवन पर फिट बैठती है। वे भी यदि राजनीति में नहीं आते तो आजीवन वह पत्रकार ही रहते। ''

हमेशा सत्य बोलने के पक्षधर रहे हैं आडवाणी

अच्युतानंद मिश्र ने आगे बताया, ''1967 कालीकट (केरल) में जनसंघ के हुए अखिल भारतीय अधिवेशन, जिसमें कि पं. दीनदयाल उपाध्याय को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था, को कवर करने के लिए मैं जब पांचजन्य से वहां गया था तब आडवाणी जी ऑर्गेनाइजर के लिए कवरेज करने वहां पहुंचे थे।'' इसके साथ ही अच्युतानंद मिश्र एक अन्य संस्मरण को सुनाते हुए बताते हैं कि इमरजेंसी के बाद जब आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने, तब कई पत्रकार उनसे मिलने गए थे। पत्रकारों ने जब आपातकाल के अपने अनुभव के बारे में बताया तो आडवाणी जी ने तुरंत बोला था कि मुझे मालूम है आपको कितना संकट था। पर जब आपको झुकने के लिए कहा गया तो आप नाक रगड़ने लगे थे। वास्तविकता यही है कि आडवाणी जी एक पत्रकार ही नहीं योग्य पत्रकार रहे और हमेशा सत्य बोलने के पक्षधर रहे। अटल-आडवाणी जी की जोड़ी भी उन दो पत्रकार मित्रों की जोड़ी रही जोकि सदैव पत्रकारों के साथ ही नहीं रहे बल्कि समय-समय पर उनके हित में लड़ने-भिड़ने वाले पत्रकार भी रहे हैं।

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