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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 6:26 · नई दिल्ली संस्करण

मिर्जापुर में गंगा तट पर बसा दिव्य धाम, जहां विराजती हैं मां विंध्यवासिनी

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
मिर्जापुर में गंगा तट पर बसा दिव्य धाम, जहां विराजती हैं मां विंध्यवासिनी

नई दिल्ली। विंध्याचल मंदिर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में गंगा तट पर बसा एक ऐसा दिव्य धाम है, जहां सालभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। इस पवित्र स्थान को विंध्याचल धाम के नाम से जाना जाता है और यहां विराजती हैं मां विंध्यवासिनी, जिन्हें शक्ति का स्वरूप और भक्तों की मनोकामना पूरी करने वाली देवी माना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां पूरी आस्था और विश्वास के साथ मां के दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं।

मां विंध्यवासिनी को मां दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी ने यहीं पर दानव राजा महिषासुर का वध करने के बाद निवास किया था, इसलिए उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है। कहा जाता है कि जब देवी ने असुरों का संहार कर दुनिया को उनके अत्याचार से मुक्त किया, तब उन्होंने विंध्याचल को अपना निवास स्थान चुना।

तभी से यह स्थान श्रद्धा और भक्ति का एक बड़ा केंद्र बन गया।

विंध्याचल धाम की खास बात यह भी है कि यह पवित्र गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहां सुबह और शाम के समय गंगा किनारे का दृश्य बेहद मनमोहक होता है। श्रद्धालु पहले गंगा स्नान करते हैं और फिर मां विंध्यवासिनी के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं। मंदिर में घंटियों की आवाज, भक्तों की जयकार और आरती का माहौल किसी को भी आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।

इस धाम की एक और विशेषता यह है कि यहां देवी के तीन प्रमुख रूपों की पूजा होती है। मां विंध्यवासिनी के साथ-साथ मां काली और मां सरस्वती के भी प्रसिद्ध मंदिर यहां मौजूद हैं। भक्त इन तीनों मंदिरों की परिक्रमा करते हैं, जिसे त्रिकोण यात्रा कहा जाता है। मान्यता है कि यह यात्रा पूरी करने से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

पौराणिक कथाओं में यह भी बताया जाता है कि भगवान राम अपने वनवास के दौरान माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ इस क्षेत्र में आए थे और यहां कुछ समय बिताया था।

इसी कारण यह स्थान धार्मिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

हर साल नवरात्रि के समय विंध्याचल धाम का नजारा बिल्कुल बदल जाता है। देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में भक्ति, उत्साह और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। कई भक्त तो नंगे पांव लंबी दूरी तय करके मां के दरबार में पहुंचते हैं।

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