मुख्य सामग्री पर जाएँ
ब्रेकिंग
Rajasthan Panchayat Election 2026: पंचायत चुनाव का ऐलान, 4 चरणों में होगी वोटिंग, जानिए पूरा शेड्यूलमुंबई में CJP का प्रदर्शन पड़ा भारी! जेल भरो आंदोलन पर FIR, आयोजकों में हड़कंपज्ञानेश कुमार पर चले लोकतंत्र की हत्या का मुकदमा! प्रमोद तिवारी का बड़ा हमलाBJP का झंडा उतारने वाले संजयन त्रिपाठी अब साइकिल पर सवार, समाजवादी पार्टी में हुए शामिलCM Yogi का बड़ा तोहफा: 4.60 लाख छात्रों के खाते में आई छात्रवृत्ति, आपके खाते में आई क्या? चेक करेंNoida: सुपरनोवा की 43वीं मंजिल से युवक ने लगाई छलांग, मौके पर दर्दनाक मौत, सोसाइटी में हड़कंपमुंबई प्रदर्शन के बाद CJP का दिल्ली कूच का ऐलान, अभिजीत दिपके ने कही ये बड़ी बातगठबंधन में फूट! रायबरेली से डरते थे राहुल गांधी! सपा नेता का बड़ा खुलासा, अखिलेश ने दी थी धमकी

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:44 · नई दिल्ली संस्करण

सीजेआई के खिलाफ 'मोटिवेटेड' कैंपेन पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 44 पूर्व जजों ने जताई कड़ी आपत्ति

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
सीजेआई के खिलाफ 'मोटिवेटेड' कैंपेन पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 44 पूर्व जजों ने जताई कड़ी आपत्ति

नई दिल्ली। देश के 44 पूर्व सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) पर रोहिंग्या प्रवासियों से जुड़ी टिप्पणियों को लेकर चल रहे 'प्रेरित और भड़काऊ अभियान' की कड़ी निंदा की है।

न्यायाधीशों ने इस मामले में 5 दिसंबर को जारी ओपन लेटर का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को प्रभावित करने का यह प्रयास स्वीकार्य नहीं है।

बता दें कि पत्र में कहा गया था कि 2 दिसंबर की सुनवाई में रोहिंग्या शरणार्थियों पर अमानवीय टिप्पणी हुई।

पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया पर तर्कसंगत आलोचना हो सकती है, लेकिन वर्तमान में जो कुछ हो रहा है, वह नियमित अदालत कार्यवाही को पक्षपातपूर्ण रूप में पेश कर न्यायपालिका की वैधता पर सवाल उठाने का प्रयास है। उन्होंने विशेष रूप से बताया कि सीजेआई केवल यह पूछ रहे थे कि कानून के तहत रोहिंग्या के कौन से अधिकार या दर्जे का दावा किया जा रहा है।

पत्र में न्यायाधीशों ने यह भी रेखांकित किया कि कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत में किसी भी व्यक्ति (नागरिक या विदेशी) के साथ यातना, गुमनामी या अमानवीय व्यवहार नहीं किया जा सकता और हर व्यक्ति की गरिमा का सम्मान होना चाहिए।

इस बात को नजरअंदाज कर अदालत पर अमानवीयता का आरोप लगाना गंभीर विकृति है।

पूर्व न्यायाधीशों ने रोहिंग्या प्रवासियों की स्थिति और कानूनी परिप्रेक्ष्य स्पष्ट करते हुए कहा कि रोहिंग्या प्रवासी भारतीय कानून के तहत शरणार्थी नहीं हैं। अधिकांश मामलों में उनकी भारत में प्रविष्टि अनियमित या अवैध है। केवल दावा करने से उन्हें कानूनी शरणार्थी दर्जा नहीं मिल सकता। भारत 1951 के यूएन शरणार्थी सम्मेलन और 1967 के प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है।

इसलिए भारत के कर्तव्य उसके संविधान, विदेशी और प्रवास कानूनों और सामान्य मानवाधिकारों से तय होते हैं, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय संधि से।

अवैध प्रवासियों द्वारा आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेज प्राप्त करना गंभीर चिंता का विषय है। यह सिस्टम की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और दस्तावेजी धोखाधड़ी तथा संगठित नेटवर्क की आशंका पैदा करता है।

ऐसे मामलों में कोर्ट-नियंत्रित विशेष जांच दल (एसआईटी) की स्थापना आवश्यक है, जो जांच करे कि अवैध प्रवासियों ने कैसे पहचान और कल्याण दस्तावेज प्राप्त किए, कौन से अधिकारी और मध्यस्थ शामिल हैं और क्या कोई तस्करी या सुरक्षा-संबंधित नेटवर्क सक्रिय हैं।

रोहिंग्या की स्थिति म्यांमार में भी जटिल है, जहां उन्हें अवैध प्रवासी माना जाता है और नागरिकता का विवाद है। इस पृष्ठभूमि में भारतीय अदालतों को कानूनी श्रेणियों के आधार पर निर्णय लेने की आवश्यकता है, न कि राजनीतिक नारे या लेबल के आधार पर।

पूर्व न्यायाधीशों ने यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप संवैधानिक सीमाओं के भीतर है और यह देश की अखंडता बनाए रखते हुए मानव गरिमा की रक्षा कर रहा है।

संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में देश के कई वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पूर्व न्यायाधीश शामिल हैं।

इनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिल दवे, जस्टिस हेमंत गुप्ता, राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अनिल देव सिंह, दिल्ली एवं जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीसी पटेल और पटना हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पीबी बाजंथरी समेत 44 प्रमुख पूर्व जजों के नाम शामिल हैं।

पूर्व न्यायाधीशों ने कहा, "भारत का संवैधानिक क्रम मानवता और सतर्कता दोनों की मांग करता है। न्यायपालिका ने मानव गरिमा की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय अखंडता बनाए रखी है और इसे सकारात्मक समर्थन मिलना चाहिए, न कि नकारात्मक प्रचार।"

यह ख़बर दूसरों तक पहुँचाएँ

WhatsAppFacebookX

संबंधित ख़बरें