नई दिल्ली,। भारत को वित्त वर्ष 2030-31 तक 2 ट्रिलियन डॉलर के कुल निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल करने के लिए अपने विनिर्माण और व्यापार पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन करने होंगे। वाणिज्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव यशवीर सिंह ने गुरुवार को कहा कि केवल छोटे-मोटे सुधारों से यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता, बल्कि उत्पादन, आपूर्ति शृंखला और निर्यात क्षमता में बड़े स्तर पर बदलाव आवश्यक होंगे।
यह केवल क्रमिक सुधारों से संभव नहीं होगा, बल्कि इसके लिए संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं।"
यशवीर सिंह ने कहा कि वैश्विक स्तर पर चर्चा में रहने वाली 'चीन प्लस वन' रणनीति को केवल चीन पर निर्भरता कम करने के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। भारत को खुद को एक ऐसे विश्वसनीय, पारदर्शी और मजबूत विनिर्माण साझेदार के रूप में स्थापित करना होगा, जो वैश्विक कंपनियों को भरोसेमंद आपूर्ति शृंखला उपलब्ध करा सके।
उन्होंने कहा, "हमें केवल 'चीन प्लस वन' नहीं बनना है। हमें भारत बनना है, एक विश्वसनीय भागीदार, एक मजबूत निर्माता और वैश्विक विकास का अगला बड़ा इंजन।"
सिंह ने कहा कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था इस समय बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। व्यापार अब केवल आर्थिक गतिविधि नहीं रह गया है, बल्कि कई देशों द्वारा इसे भू-राजनीतिक रणनीति के एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के हालिया घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली चुनौतियों का सामना कर रही है। डब्ल्यूटीओ के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में मतभेद और उसके अपीलीय निकाय की लंबे समय से जारी निष्क्रियता इस बदलते परिदृश्य के उदाहरण हैं।
उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत 'सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र' व्यवस्था भी अब दबाव में है।
पारस्परिक शुल्क, एकतरफा प्रतिबंध और सुरक्षा संबंधी अपवादों के विस्तार ने पारंपरिक व्यापार ढांचे को प्रभावित किया है।
यशवीर सिंह ने कहा, "महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात प्रतिबंधों का रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है। प्रौद्योगिकी तक पहुंच को सीमित करने के लिए कृत्रिम बाधाएं खड़ी की जा रही हैं। व्यापार अब केवल आर्थिक साधन नहीं रहा, बल्कि भू-राजनीतिक नीति का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।"
उन्होंने बताया कि वैश्विक विनिर्माण और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं का अत्यधिक केंद्रीकरण अब आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी बड़ी चिंता बन चुका है।
वर्ष 1990 में वैश्विक विनिर्माण मूल्यवर्धन में चीन की हिस्सेदारी लगभग 3 प्रतिशत थी, जो बढ़कर 2024 में करीब 28 प्रतिशत हो गई। इसके अलावा दुर्लभ मृदा तत्वों, ग्रेफाइट और मैग्नीशियम जैसे कई महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण और परिशोधन में भी चीन का मजबूत प्रभुत्व है।





