भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अगुवाई में पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची जारी की गई है। इसमें कई पुराने दिग्गजों को मुख्य भूमिका दी गई है और चुनावी राज्यों का प्रभार सौंपा गया है।
भारतीय जनता पार्टी की नेशनल एग्जीक्यूटिव की बहुप्रतीक्षित नई लिस्ट जारी कर दी गई है। पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के नेतृत्व में बनी इस नई टीम में कई अनुभवी नेताओं को फिर से मुख्य भूमिका में लाया गया है, जबकि कई रणनीतिकारों को बड़े राज्यों की सीधी जिम्मेदारी सौंपी गई है। हालांकि, संगठन में हुए इस बड़े बदलाव में राजनीति के दो दिग्गज नेताओं के नाम गायब हैं। ओडिशा की राजनीति में गहरी पकड़ रखने वाले धर्मेंद्र प्रधान और बिहार के वरिष्ठ रणनीतिकार मंगल पांडे का लिस्ट में न होना दिल्ली से लेकर राज्यों के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। अब हर कोई यह सवाल कर रहा है कि क्या हालिया विवादों के कारण इन दोनों को जानबूझकर मुख्यधारा से दूर रखा गया है, या फिर यह किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी है।
धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय से केंद्र सरकार के सबसे मज़बूत और भरोसेमंद चेहरों में से एक रहे हैं। ओडिशा के क्षेत्रीय और राजनीतिक माहौल पर उनकी पकड़ बहुत मज़बूत मानी जाती है। हालाँकि, 25 जुलाई को उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया, जिसके बाद शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार प्रह्लाद जोशी को सौंप दिया गया। असल में, परीक्षा प्रणाली में पेपर लीक और गड़बड़ियों को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नेतृत्व में 20 जुलाई को हुए संसद मार्च के बाद देश भर में ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया था। प्रधान का इस्तीफ़ा जनता के इस गुस्से को शांत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया। ऐसी अटकलें थीं कि सरकार से हटने के बाद उन्हें संगठन में राष्ट्रीय स्तर का कोई बड़ा पद दिया जाएगा, लेकिन 17 अगस्त को जारी नई सूची ने सभी को चौंका दिया। गौरतलब है कि उन्हें 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी का चुनाव प्रभारी भी बनाया गया था।
दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के अनुभवी नेता मंगल पांडे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। नीतीश सरकार में कई सालों तक स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने वाले पांडे, बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल चुनावों के दौरान राज्य प्रभारी रह चुके हैं। बिहार चुनावों के बाद जब सम्राट चौधरी के नेतृत्व में राज्य में नई सरकार बनी, तो 15 अप्रैल, 2026 को मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें शामिल नहीं किया गया। उस समय राजनीतिक जानकारों का कहना था कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर संगठन का काम संभालने के लिए दिल्ली बुलाया जाएगा। हालांकि, नितिन नवीन की केंद्रीय टीम में उनका नाम न होने से कई तरह के राजनीतिक संकेत मिल रहे हैं। इस बीच, पार्टी ने उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात जैसे चुनावी राज्यों के लिए विनोद तावड़े, सतीश पूनिया और तरुण चुघ जैसे दिग्गज नेताओं को प्रभारी बनाकर अपनी नई रणनीति साफ कर दी है।
बीजेपी के काम करने का तरीका हमेशा से चौंकाने वाला रहा है। पार्टी में कोई पद न मिलना किसी नेता का राजनीतिक अंत नहीं माना जाता। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए जानकार इसे चल रहे विवादों से दूरी बनाए रखने की रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं। बीजेपी संसदीय बोर्ड का जल्द ही पुनर्गठन होने वाला है, लेकिन इस बात पर सस्पेंस बना हुआ है कि क्या इन दो नेताओं को पार्टी की सबसे ताकतवर बॉडी में जगह मिलेगी या नहीं। दोनों ही संगठन के पुराने और ज़मीनी स्तर से जुड़े नेता रहे हैं, इसलिए भविष्य में उन्हें नई ज़िम्मेदारियां मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। 2027 में देश के 7 बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में साल की शुरुआत में चुनाव प्रस्तावित हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में साल के आखिर में वोटिंग होगी। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडे के लिए सबसे स्वाभाविक रास्ता इन राज्यों में चुनाव प्रभारी बनना ही लगता है।
हालांकि, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पार्टी ने विनोद तावड़े को प्रभारी और जगदीश पटेल को सह-प्रभारी नियुक्त किया है। वहीं, पंजाब की कमान सतीश पूनिया को और गुजरात की कमान तरुण चुघ को सौंपी गई है। पिछले चुनावों में, विनोद तावड़े बिहार के लिए पार्टी प्रभारी थे, जबकि धर्मेंद्र प्रधान ने चुनाव प्रभारी की भूमिका निभाई थी। बंगाल में मंगल पांडे को भूपेंद्र यादव के साथ काम करने की जिम्मेदारी दी गई थी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नितिन नवीन इन राज्यों में इन दोनों नेताओं के व्यापक संगठनात्मक अनुभव का लाभ उठाते हैं, या फिर इन दोनों दिग्गज नेताओं का राजनीतिक वनवास और लंबा खिंचता है।





