वंदे मातरम पर भाजपा का प्रस्ताव, कांग्रेस CWC के फैसले को बताया दुर्भाग्यपूर्ण

वंदे मातरम पर भाजपा का प्रस्ताव, कांग्रेस CWC के फैसले को बताया दुर्भाग्यपूर्ण

नई दिल्ली। वंदे मातरम् के सम्मान और उसकी ऐतिहासिक विरासत की रक्षा के संबंध में भाजपा ने शनिवार को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया।

प्रस्ताव की कॉपी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने लिखा कि भाजपा 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा 1937 के अपने प्रस्ताव को पुनः स्वीकार करते हुए कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘वन्दे मातरम्’ के केवल प्रथम दो पदों के गायन को सीमित करने के निर्णय की कड़ी निंदा और स्पष्ट शब्दों में विरोध करती है।

 भाजपा वन्दे मातरम् को भारत का राष्ट्रीय गीत, भारत माता के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र और भारत की राष्ट्रीय चेतना का अमर प्रतीक मानती है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्दे मातरम् ने भारत माता के प्रति भक्ति और समर्पण को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी और राष्ट्रीय जागरण का एक शक्तिशाली माध्यम बना। वन्दे मातरम्, जिसका अर्थ है "हे माता, मैं तुझे नमन करता हूं" 1905 में बंगाल विभाजन के बाद चले स्वदेशी आंदोलन के दौरान प्रतिरोध की हुंकार बना और देश के कोने-कोने तक पहुंचा।

 नवीन ने आगे पोस्ट में लिखा कि गीत की क्रांतिकारी शक्ति को पहचानते हुए ब्रिटिश साम्राज्य ने इसे बार-बार दबाने का प्रयास किया। 1906 में बरिसाल में इसके सार्वजनिक गायन पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन इसकी आवाज को दबाया नहीं जा सका। 1907 में स्टुटगार्ट में भीकाजी कामा द्वारा प्रदर्शित ध्वज पर वन्दे मातरम् अंकित था और शीघ्र ही यह राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना में गहराई से समाहित हो गया। 

इसलिए यह इतिहास की विडंबना है कि जिस वन्दे मातरम् को अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना जगाने के कारण दबाने का प्रयास किया था, उसी वन्दे मातरम् को कुछ दशकों बाद कांग्रेस ने सांप्रदायिक तुष्टीकरण के नाम पर छह में से केवल दो पदों तक सीमित कर दिया। 

 भाजपा प्रमुख ने कहा कि कांग्रेस ने कभी वन्दे मातरम् के राष्ट्रीय महत्व को स्वीकार किया था, लेकिन बाद में बढ़ते सांप्रदायिक दबाव के आगे झुकती चली गई। 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में जब पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने वन्दे मातरम् गाना प्रारंभ किया, तब कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने आपत्ति जताई और अधिवेशन से बाहर चले गए। 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रीय अवसरों पर वन्दे मातरम् के छह में से केवल प्रथम दो पद गाए जाएंगे। 

बाद के पदों में धार्मिक संदर्भों को लेकर उठाई गई आपत्तियों को स्वीकार करते हुए कांग्रेस ने राष्ट्रीय गीत के पूर्ण स्वरूप को सीमित किया। यह उस व्यापक तुष्टीकरण की राजनीति का हिस्सा था जिसने सांप्रदायिक और अलगाववादी राजनीति को लगातार अधिक स्थान दिया। इसी राजनीतिक वातावरण में द्विराष्ट्र सिद्धांत को बल मिला और अंततः भारत को विभाजन की त्रासदी झेलनी पड़ी। प्रस्ताव का जिक्र करते हुए नितिन नवीन ने आगे बताया कि इस निर्णय की राजनीतिक पृष्ठभूमि 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना और पंडित जवाहरलाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार से भी स्पष्ट होती है।

 मुस्लिम लीग की चौदह मांगों में वन्दे मातरम् को पूरी तरह त्यागने की मांग भी शामिल थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय अवसरों पर वन्दे मातरम् के छह में से चार पदों को हटाने के कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय का बचाव और समर्थन किया। इस प्रकार सांप्रदायिक आपत्तियों को राष्ट्रीय गीत के सार्वजनिक स्वरूप को प्रभावित करने की अनुमति दी गई।

 लेकिन वन्दे मातरम् के इतिहास को केवल उसके कुछ पदों के धार्मिक संदर्भों तक सीमित करना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के साथ अन्याय होगा। महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए नवीन ने कहा कि उन्होंने स्वयं वन्दे मातरम् के बारे में लिखा था कि इसका स्रोत क्या था और इसकी रचना कब और कैसे हुई, यह अलग बात है। 

लेकिन बंगाल के विभाजन के दिनों में यह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली युद्धघोष बन गया था। यह साम्राज्यवाद-विरोधी नारा था। जब मैं छोटा था और न आनंदमठ के बारे में जानता था, न उसके अमर रचयिता बंकिम के बारे में, तब भी वन्दे मातरम् ने मुझे अपने प्रभाव में ले लिया था। जब मैंने इसे पहली बार सुना और गाया, तो यह मुझे मंत्रमुग्ध कर गया। मैंने इसके साथ शुद्धतम राष्ट्रीय भावना को जोड़ा। मुझे कभी यह विचार नहीं आया कि यह हिंदुओं का गीत है या केवल हिंदुओं के लिए है। 

दुर्भाग्य से, आज हम बुरे दौर में आ गए हैं। महात्मा गांधी का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि वन्दे मातरम् का ऐतिहासिक अर्थ केवल उसके कुछ पदों में प्रयुक्त धार्मिक बिंबों तक सीमित नहीं था। करोड़ों भारतीयों के लिए यह स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान साम्राज्यवाद-विरोधी हुंकार और शुद्ध राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति बन चुका था। 24 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया जाएगा और वन्दे मातरम्, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, को जन गण मन के साथ "समान सम्मान और समान दर्जा" प्राप्त होगा। इस प्रकार स्वतंत्र भारत ने स्वयं अपना संवैधानिक समाधान प्रस्तुत किया। जन गण मन औपचारिक राजकीय प्रोटोकॉल में राष्ट्रगान के रूप में स्थापित हुआ, जबकि वन्दे मातरम् राष्ट्रीय गीत के रूप में समान राष्ट्रीय सम्मान और गौरव के साथ भारत की राष्ट्रीय चेतना में प्रतिष्ठित रहा। 

लेकिन स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे वन्दे मातरम् के प्रथम दो पद ही सार्वजनिक गायन की मानक परंपरा बन गए और शेष चार पद नई पीढ़ियों के लिए अपरिचित होते गए। परिणाम यह हुआ कि भारत के पास छह पदों वाला राष्ट्रीय गीत था, लेकिन पीढ़ियां मुख्यतः उसके दो पदों को ही जानती रहीं। नवीन ने आगे पोस्ट में लिखा कि यह केवल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा विषय नहीं है।

 यह भारत के सम्मान और उन असंख्य देशभक्तों की विरासत का प्रश्न है, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भारतीय जनता पार्टी देशवासियों से आह्वान करती है कि वे स्मरण रखें - वन्दे मातरम् के शब्द कभी इतने शक्तिशाली थे कि एक साम्राज्य उनसे भयभीत हो उठा था। अंग्रेजों ने इन्हें दबाने का प्रयास इसलिए किया क्योंकि इन शब्दों ने प्रतिरोध की चेतना जगाई थी।

 पीढ़ियों के भारतीयों ने इन्हें स्वतंत्रता, बलिदान और राष्ट्रगौरव के मंत्र के रूप में अपनाया। इस विरासत को आज की वोट-बैंक राजनीति की गणित में सीमित नहीं किया जा सकता।1947 में भारत की स्वतंत्रता का जयघोष 'वंदे मातरम्' था, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2047 के 'विकसित भारत' का महाघोष भी 'वंदे मातरम्' ही होगा।

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