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दोषी के वारिसों को अपील जारी रखने का हक तो पीडित के वारिसों को क्यों नहीं-हाईकोर्ट


जयपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा है कि आपराधिक मामलों में पक्षकारों की मृत्यु के बाद दोषी के वारिस को अपील जारी रखने का हक तो पीडित के वारिसों को इस हक से महरूम क्यों किया गया है। अदालत ने इसे संविधान के विपरीत और भेदभावपूर्ण मानते हुए कानूनी प्रावधानों में संशोधन की आवश्यकता जताई है। अदालत ने कहा कि विधायिका इस बारे में संशोधन पर विचार करे। जस्टिस अनूप कुमार ने यह आदेश शिमला शर्मा की मौत के बाद उसके उत्तराधिकारियों की आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि मृत्यु के बाद अपील जारी रखने के संबंध में दोनों पक्षों को समान अधिकार मिलना चाहिए। अभी पीड़ित की मौत के बाद उसके वारिसों को अपील जारी रखने का अधिकार नहीं है। विधायिका दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 394 में संशोधन पर विचार करे, ताकि आरोपित पक्ष की तरह ही मृतक पीड़ित के कानूनी वारिसों को भी अपील जारी रखने या अपील दायर करने का अधिकार मिल सके। इसके साथ ही अदालत ने आदेश की कॉपी विधि आयोग को भी भेजी है। अदालत ने विधि आयोग से सीआरपीसी में पीड़ित के परिवार को अधिकार देने के लिए संशोधन के बारे में विधायिका को सुझाव देने को कहा गया है।

मामले के अनुसार शिमला शर्मा ने कानोता थाने में शिकायत दर्ज कराई कि उसके दादा गोविन्द नारायण की 1 बीघा 5 बिस्वा जमीन थी और उनकी कोई संतान नहीं होने के कारण मृत्यु के बाद शिकायतकर्ता के पिता भन्नालाल शर्मा उनके उत्तराधिकारी बने। वहीं विरोधी पक्ष ने सरपंच से मिलकर राजस्व रिकॉर्ड में जमीन अपने नाम दर्ज करवा ली। इस मामले में दिसम्बर 2012 में अदालत की ओर से विरोधी पक्ष को बरी कर दिया गया। इसकी अपील जयपुर महानगर के एडीजे क्रम-8 कोर्ट में दायर की गई, लेकिन सितम्बर, 2013 में शिकायतकर्ता का निधन हो गया। इसके बाद विरोधी पक्ष ने अपील जारी रखने पर आपत्ति दर्ज कराई।

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