कभी मार्शल आर्ट सिखाने वाला यह युवक धीरे-धीरे उस काले
संसार का हिस्सा बन गया। उसके जीवन के अधूरे सफर का अंत देहरादून में जिम के बाहर गोलियों की तड़तडाहट के बीच हुआ।
कहा जाता है कि अपराध की दुनिया में उसकी असली पहचान तब बनी जब उसका संपर्क झारखंड के चर्चित गैंगस्टर अखिलेश सिंह से हुआ। युवा अवस्था से कराटे ट्रेनिंग से शुरू हुआ यह रिश्ता आगे चलकर रणनीतिक साझेदारी में बदल गया। दोनों अपराध की दुनिया में आ गए। इस कड़ी में कई बड़े घटनाक्रमों में सामने अखिलेश सिंह दिखता था, लेकिन पटकथा विक्रम शर्मा लिखता था।
वर्ष 1998 में बिष्टुपुर के कीनन स्टेडियम के पास ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा की दिनदहाड़े हत्या ने शहर को हिला दिया। करोड़ों की संपत्ति के मालिक अशोक शर्मा की मौत के बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं, कई आरोपितों के नाम उछले। हालांकि अदालत में कई आरोप टिक नहीं पाए और कुछ आरोपित बरी हो गए, लेकिन शहर की स्मृति में यह मामला लंबे समय तक ताजा रहा।
इस हत्याकांड के बाद घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया जिसने कानाफूसी को और हवा दी। अशोक शर्मा की पत्नी पिंकी शर्मा संपत्ति की अकेली वारिस बनीं। कुछ समय बाद उनका विवाह विक्रम शर्मा के छोटे भाई से हुआ। आलोचकों ने इसे महज पारिवारिक रिश्ता नहीं, बल्कि संपत्ति और प्रभाव के समीकरण के रूप में देखा। समर्थकों ने इसे संयोग बताया, जबकि विरोधियों ने रणनीति का हिस्सा कहा ।
वर्ष 2007 और 2008 के बीच शहर में हुई कई फायरिंग और हत्याओं में भी विक्रम शर्मा का नाम चर्चा में आया। इनमें साकची, बर्मामाइंस और अन्य इलाकों में हुई वारदातों ने उसे फिर सुर्खियों में ला दिया। कई मामलों में अदालत से राहत मिलने के बावजूद विक्रम शर्मा की छवि बैकस्टेज प्लेयर की बनी रही।
अपराध की दुनिया के साथ-साथ उसने कारोबार में भी हाथ आजमाया। उसने परिवहन और अन्य व्यवसायों में दखल बढ़ाया, एक मीडिया हाउस की शुरुआत की और सार्वजनिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। नेताओं के साथ मुलाकातों की तस्वीरें, सोशल मीडिया पर सक्रियता, अंगरक्षकों का घेरा और आलीशान जीवन, यह सब विक्रम शर्मा की पहचान का हिस्सा बन गया। वह यह संदेश देना चाहता था कि अब उसका लक्ष्य सिर्फ डर नहीं, बल्कि सत्ता है।
बताया जाता है कि विक्रम शर्मा चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में था। अपराध से अर्जित प्रभाव, व्यापार से जुटाए संसाधन और राजनीति में प्रवेश की महत्वाकांक्षा ने मिलकर उसकी कहानी को और जटिल बना दिया।
लेकिन देहरादून में जिम से बाहर निकलते वक्त चली गोलियों ने इस पूरे अध्याय को अचानक विराम दे दिया। जिस शख्स पर आरोप था कि वह पर्दे के पीछे से खेल रचता है, उसका अंत खुलेआम हो गया।
गुरु, गैंग और ग्लैमर: जमशेदपुर से देहरादून तक विक्रम शर्मा के अधूरे सफर का अंत
पूर्वी सिंहभूम। शहर की आपराधिक फाइलों, कारोबारी सौदों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बीच विक्रम शर्मा का नाम दो दशकों तक बार-बार उभरता रहा।












