छत्तीसगढ़ और ओडिशा ने महानदी जल विवाद के समाधान की पहल करते हुए किया संयुक्त तकनीकी रिपोर्ट पेश

छत्तीसगढ़ और ओडिशा ने महानदी जल विवाद के समाधान की पहल करते हुए किया संयुक्त तकनीकी रिपोर्ट पेश
रायपुर : छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच दशकों पुराना महानदी जल विवाद के समाधान की पहल करते हुए दोनों राज्यों ने महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (एमडबल्यूडीटी) के सामने संयुक्त तकनीकी रिपोर्ट पेश की है
जिसमें पानी के प्रवाह और उपलब्धता के आंकड़े शामिल हैं। 20 अप्रैल को ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को चेतावनी देते हुए विवाद के समाधान के लिए कदम उठाने का आखिरी मौका दिया था।
यह संयुक्त तकनीकी रिपोर्ट 02 मई 2026 को महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के समक्ष पेश की गई है। न्यायाधिकरण ने इसे सकारात्मक कदम मानते हुए 30 मई 2026 तक अंतिम निपटारे के लिए समझौता फॉर्मूला पेश करने का निर्देश दिया है।
 ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को 02 मई 2026 तक की समय सीमा में 45 बिंदुओं पर हुई बातचीत और शेष मुद्दों पर आम सहमति बनाकर रिपोर्ट देने को कहा था, जिस पर प्रगति हुई है। न्यायाधिकरण की अध्यक्ष न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे विवाद सुलझाने की दिशा में एक "ऐतिहासिक मील का पत्थर" माना है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने इस संयुक्त तकनीकी रिपोर्ट को मंजूरी दे दी है। 
पहली बार दोनों राज्य 1980-81 से 2018-19 तक के साझा जल उपलब्धता आंकड़ों (डेटा सीरीज) पर सहमत हुए हैं, जिससे तथ्यों को लेकर जारी कानूनी बाधा दूर हो गई है। रिपोर्ट में पानी के निश्चित आयतन के बजाय अनुपातिक बंटवारा की ओर बढ़ने के संकेत हैं, जिसका मतलब है कि कम पानी वाले वर्षों में दोनों राज्य समान रूप से कमी का भार उठाएंगे।
संयुक्त रिपोर्ट में पानी के बंटवारे के लिए 'प्रोपोर्शनल शेयरिंग' यानी आनुपातिक हिस्सेदारी का फॉर्मूला सुझाया गया है।
 इस नए फॉर्मूले के अनुसार यदि किसी साल बारिश कम होती है और महानदी में पानी का स्तर गिरता है, तो दोनों राज्यों को अपने कोटे में बराबर अनुपात में कटौती करनी होगी। ऐसा नहीं होगा कि ऊपरी राज्य (छत्तीसगढ़) पूरा पानी रोक ले और निचला राज्य (ओडिशा) सूखा रह जाए। पहले विवाद इस बात पर था कि कितने 'क्यूसेक' पानी मिलना चाहिए। 
अब सहमति इस पर बन रही है कि उपलब्ध कुल पानी का एक निश्चित प्रतिशत दोनों राज्यों में बांटा जाएगा। रिपोर्ट में 1980 से 2019 तक के (लगभग 40 साल) पानी के बहाव का अध्ययन किया गया है। इसी डेटा के आधार पर तय किया जाएगा कि गैर-मानसूनी महीनों में दोनों राज्यों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी।

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