सोशल मीडिया पर एक पुरानी वैज्ञानिक गणना वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि 13 नवंबर 2026 को पृथ्वी पर प्रलय जैसी स्थिति बन सकती है। इस दावे के वायरल होने के बाद लोगों में चिंता बढ़ गई है। हालांकि वैज्ञानिक का कहना है कि यह दावा एक पुराने गणितीय मॉडल की गलत व्याख्या पर आधारित है और इससे दुनिया के भौतिक रूप से समाप्त होने की कोई भविष्यवाणी नहीं थी।
इस चर्चा की शुरुआत वर्ष 1960 में प्रकाशित एक शोध पत्र से हुई थी। शोधकर्ताओं ने जनसंख्या वृद्धि और सामाजिक रुझानों के आधार पर एक गणितीय मॉडल प्रस्तुत किया था। उस समय दुनिया की आबादी करीब तीन अरब थी। मॉडल में अनुमान लगाया गया था कि यदि जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार लगातार उसी प्रकार बढ़ती रही तो 13 नवंबर 2026 के आसपास यह गणितीय रूप से अनंत की दिशा में पहुंच सकती है। वर्ष 2026 में इस पुरानी गणना को सोशल मीडिया पर दुनिया के अंत की भविष्यवाणी के रूप में पेश किया जा रहा है। कई लोग इसे साझा करते हुए दावा कर रहे हैं कि पृथ्वी की जनसंख्या अपनी अधिकतम क्षमता पार कर जाएगी।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि मूल शोध का उद्देश्य पृथ्वी के नष्ट होने या किसी निश्चित दिन प्रलय आने की घोषणा करना नहीं था। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह एक हाइपरबोलिक वृद्धि मॉडल था, जिसमें यह मान लिया गया था कि जनसंख्या वृद्धि की गति लगातार बढ़ती रहेगी। वास्तविक दुनिया में ऐसा नहीं हुआ। जनसांख्यिकीय बदलाव के कारण अधिकांश देशों में जन्म दर में कमी आई है। शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, शहरीकरण और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी जैसे कारकों ने जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार को धीमा किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि मशीनों को इंसानों की तरह समझने और सोचने वाला मान लेना खतरनाक हो सकता है। आज चैटबॉट और एआई आधारित प्रणालियों के साथ लोगों के भावनात्मक जुड़ाव के बीच उनकी यह बात प्रासंगिक लगती है। कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ता उनकी एआई संबंधी टिप्पणी को सही मानते हुए जनसंख्या संबंधी पुराने मॉडल को भी सटीक भविष्यवाणी बता रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों बातों को जोड़कर 13 नवंबर 2026 को प्रलय आने का निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। वर्तमान जनसंख्या रुझान पुराने मॉडल की मूल धारणाओं से अलग हैं और उस तारीख को दुनिया के समाप्त होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है।