बिहार के सरकारी स्कूलों में कार्यरत करीब 800 शिक्षकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। शिक्षा विभाग ऐसे शिक्षकों के रिकॉर्ड की जांच की तैयारी कर रहा है, जो सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के साथ-साथ बिना विभागीय अनुमति के विभिन्न विश्वविद्यालयों से रेगुलर कोर्स करने की बात सामने आई है। इनमें पीएचडी, एमए, एमएससी, एलएलबी और एमएड जैसे पाठ्यक्रम शामिल बताए जा रहे हैं। मामला केवल नौकरी के साथ उच्च शिक्षा हासिल करने का नहीं है। विभाग यह भी पता लगाने की कोशिश करेगा कि यदि कोई शिक्षक नियमित रूप से विश्वविद्यालय या कॉलेज की कक्षाओं में उपस्थित हो रहा था, तो उसी अवधि में सरकारी स्कूल में उसकी उपस्थिति किस तरह दर्ज हुई। जांच में स्कूल की हाजिरी, विभागीय अनुमति, छुट्टी के रिकॉर्ड और विश्वविद्यालय की उपस्थिति का मिलान किया जा सकता है।
दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों से पढ़ाई करने वाले शिक्षक भी दायरे में: बताया जा रहा है कि जांच का दायरा बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब समेत दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों से रेगुलर कोर्स करने वाले शिक्षकों के रिकॉर्ड की भी पड़ताल की जा सकती है। विभाग यह देखेगा कि संबंधित शिक्षक ने सरकारी सेवा में रहते हुए किस वर्ष और किस संस्थान में दाखिला लिया। पाठ्यक्रम रेगुलर था या अन्य माध्यम से, उसमें नियमित उपस्थिति की क्या व्यवस्था थी और पढ़ाई के लिए विभाग से अनुमति ली गई थी या नहीं—इन बिंदुओं को जांच में शामिल किया जा सकता है।
डिग्री से ज्यादा स्कूल में उपस्थिति पर फोकस: शिक्षा विभाग की चिंता शिक्षकों के उच्च शिक्षा हासिल करने को लेकर नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में उनकी नियमित उपस्थिति और बच्चों की पढ़ाई को लेकर है। शिक्षक अपनी योग्यता बढ़ाएं, इसे विभाग सीधे तौर पर गलत नहीं मानता। लेकिन यदि किसी शिक्षक की पढ़ाई के कारण स्कूल की जिम्मेदारियां प्रभावित हुईं या उसने बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहकर रेगुलर कोर्स किया, तो यह सेवा नियमों का मामला बन सकता है। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी भी पहले कह चुके हैं कि शिक्षक अपनी योग्यता बढ़ा सकते हैं, लेकिन इसका असर बच्चों की पढ़ाई पर नहीं पड़ना चाहिए। ऐसे में विभाग का जोर इस बात पर है कि उच्च शिक्षा हासिल करते समय शिक्षकों ने सेवा नियमों का पालन किया या नहीं।
हाजिरी में गड़बड़ी की शिकायतों की भी हो सकती है जांच: जांच के दौरान शिक्षकों की स्कूल उपस्थिति को भी गंभीरता से देखा जा सकता है। कुछ मामलों में शिक्षकों द्वारा आपसी तालमेल के जरिए उपस्थिति दर्ज कराने की शिकायतों की चर्चा है। हालांकि, इसकी वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। यदि किसी शिक्षक की विश्वविद्यालय में नियमित उपस्थिति दर्ज पाई जाती है और उसी अवधि में स्कूल के रिकॉर्ड में भी उसकी लगातार उपस्थिति दर्ज है, तो विभाग इस विसंगति की जांच कर सकता है। फर्जी हाजिरी या रिकॉर्ड में गड़बड़ी की पुष्टि होने पर मामला केवल बिना अनुमति पढ़ाई करने तक सीमित नहीं रहेगा।
विश्वविद्यालयों से भी मांगा जा सकता है रिकॉर्ड: जांच के लिए पहले प्रखंड और जिला स्तर से संबंधित शिक्षकों की जानकारी जुटाई जा सकती है। इसके बाद जरूरत पड़ने पर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से प्रवेश, पाठ्यक्रम और उपस्थिति से संबंधित रिकॉर्ड मांगे जा सकते हैं। जांच में शिक्षक की नियुक्ति की तारीख, विश्वविद्यालय में दाखिले का वर्ष, कोर्स का माध्यम, कक्षाओं की अनिवार्यता और विभागीय अनुमति जैसे बिंदुओं का मिलान किया जाएगा। स्कूल की हाजिरी और विश्वविद्यालय की उपस्थिति के बीच समान अवधि मिलने पर संबंधित शिक्षक से स्पष्टीकरण भी मांगा जा सकता है।
नियमों का उल्लंघन साबित हुआ तो विभागीय कार्रवाई संभव: सरकारी सेवा के दौरान उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए संबंधित सेवा नियमों और विभागीय अनुमति का पालन आवश्यक हो सकता है। यदि जांच में किसी शिक्षक द्वारा नियमों का उल्लंघन किए जाने की पुष्टि होती है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। कार्रवाई की प्रकृति मामले की गंभीरता और लागू सेवा नियमों के आधार पर तय होगी। इसमें स्पष्टीकरण मांगने से लेकर अन्य विभागीय कार्रवाई तक के कदम उठाए जा सकते हैं। ऐसे में जांच के दायरे में आए शिक्षकों के लिए अपने शैक्षणिक और सेवा संबंधी दस्तावेजों को स्पष्ट रखना महत्वपूर्ण होगा।
ओपन और डिस्टेंस मोड को माना जा सकता है व्यावहारिक विकल्प: नौकरी के साथ उच्च शिक्षा हासिल करने वाले शिक्षकों के लिए ओपन और डिस्टेंस लर्निंग भी एक विकल्प है। इग्नू और नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के माध्यम से कई पाठ्यक्रम नौकरीपेशा लोगों के लिए उपलब्ध होते हैं। हालांकि, किसी भी पाठ्यक्रम में दाखिले से पहले संबंधित सेवा नियमों और विभागीय अनुमति की शर्तों की जानकारी लेना जरूरी है। अब शिक्षा विभाग की प्रस्तावित जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि करीब 800 शिक्षकों में कितने मामलों में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है। फिलहाल स्कूल की हाजिरी, विभागीय अनुमति और विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के बीच संभावित विसंगतियों की जांच को लेकर शिक्षकों के बीच भी चर्चा तेज है।