दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर वही कहा है जो दिल्ली का हर नागरिक रोज सड़क पर भुगतता है, लेकिन जिसे सुनने के लिए प्रशासन के कान बंद हैं। अदालत ने अतिक्रमण पर नाराजगी जताते हुए एक सीधा और तीखा सवाल पूछा है - बिना पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत के सड़कों पर अवैध कब्जा कैसे हो सकता है? यह सवाल नहीं, इस पूरी सड़ी हुई व्यवस्था पर एक चार्जशीट है।
यह कोई नई बात नहीं है। हर दो-तीन महीने में हाईकोर्ट फटकार लगाता है, एमसीडी और पुलिस को नोटिस देता है, स्टेटस रिपोर्ट मांगता है। अगले दिन दो जेसीबी लेकर कुछ खोखे तोड़े जाते हैं, फोटो खिंचवाए जाते हैं और तीसरे दिन वही खोखे, वही अवैध पार्किंग, उसी जगह पर दोगुनी वसूली के साथ वापस आ जाते हैं। यह अतिक्रमण नहीं, यह दिल्ली में समानांतर सरकार का धंधा है।
दिल्ली में फुटपाथ नाम की चीज अब किताबों में ही बची है। हकीकत में फुटपाथ अब दुकानों का गोदाम है। करोल बाग में जूते की दुकान का सारा माल फुटपाथ पर है, लाजपत नगर में कपड़ों के स्टैंड फुटपाथ पर हैं, शाहीन बाग और जामिया में खाने के ठेले और कबाड़ की दुकानों ने फुटपाथ निगल लिया है, चांदनी चौक में तो फुटपाथ का नाम लेना भी गुनाह है।
नतीजा क्या है? एक गर्भवती महिला, एक बुजुर्ग, एक स्कूल का बच्चा सड़क पर चलने को मजबूर है। उसे बस, ऑटो और कारों के बीच अपनी जान बचाकर चलना पड़ता है। जब हादसा होता है तो पुलिस कहती है - सड़क पर क्यों चल रहे थे? सवाल यह है कि वह फुटपाथ पर चले तो कैसे चले?
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि फुटपाथ पर चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, यह अनुच्छेद 21 में जीने के अधिकार का हिस्सा है। लेकिन दिल्ली में इस मौलिक अधिकार की कीमत हर महीने हफ्ते के रूप में वसूली जाती है।
अवैध पार्किंग - सबसे बड़ा संगठित घोटाला
अगर दुकानें फुटपाथ खा रही हैं तो अवैध पार्किंग पूरी सड़क खा रही है। दिल्ली में वैध पार्किंग की जगहें उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं, लेकिन हर मार्केट, हर अस्पताल, हर मेट्रो स्टेशन के बाहर 100 रुपये में गाड़ी खड़ी करने वाले लड़के खड़े हैं। न वर्दी, न रसीद, न रेट लिस्ट। बस एक लाठी और सीटी।
यह पैसा कहां जाता है? यह दिल्ली का सबसे बड़ा अन-ऑडिटेड कैश बिजनेस है। एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ साउथ दिल्ली के बाजारों से हर दिन 15 से 20 लाख रुपये की अवैध पार्किंग वसूली होती है। यह पैसा बिना किसी रसीद के बंटता है। इसके बिना क्या यह धंधा चल सकता है? हाईकोर्ट ने बिल्कुल सही पकड़ा है - यह पुलिस और स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे नहीं, उनकी नाक के इशारे पर चल रहा है।
एमसीडी कहती है हमारे पास स्टाफ नहीं है, पुलिस कहती है यह हमारा काम नहीं है। दोनों सच बोलते हैं - काम तो वसूली का है, अतिक्रमण हटाना तो सिर्फ फाइलों में है।
हाईकोर्ट ने इस बार एक बहुत अहम बात कही है - हर थाने के थाना प्रभारी की जिम्मेदारी तय करो। यह सबसे जरूरी है। एक थाना प्रभारी को अपने इलाके की हर गली की खबर होती है। उसे पता होता है कि कहां सट्टा चल रहा है, कहां शराब बिक रही है, तो क्या उसे नहीं पता कि उसके थाने के सामने वाली 60 फुट की सड़क 20 फुट की कैसे रह गई?
दरअसल सिस्टम ऐसा बना दिया गया है कि अतिक्रमण हटाना नाकामी का सबूत है और उसे बनाए रखना कमाई का सबूत। जब तक किसी थाना प्रभारी या जूनियर इंजीनियर का प्रमोशन या ट्रांसफर अतिक्रमण के आधार पर नहीं रुकेगा, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। कोर्ट को चाहिए कि वह आदेश दे कि अगर किसी इलाके में दोबारा अतिक्रमण मिला तो संबंधित थाना प्रभारी और जेई को सस्पेंड माना जाए।
इस पूरे खेल में पिस कौन रहा है? दिल्ली का आम मेहनतकश आदमी।
ऑटो वाला जाम में फंसता है तो उसकी दिहाड़ी कम होती है। एम्बुलेंस जाम में फंसती है तो मरीज मरता है। बारिश में नाली इसलिए जाम होती है क्योंकि नाली के ऊपर दुकान का फर्श बना दिया गया है। आग लगती है तो फायर ब्रिगेड इसलिए नहीं पहुंच पाती क्योंकि सड़क पर अवैध पार्किंग है। यह अतिक्रमण सिर्फ जगह घेरना नहीं है, यह लोगों की जान लेना है।
दिल्ली में अतिक्रमण को गरीबों की रोजी-रोटी से जोड़कर एक भावनात्मक कवच पहना दिया जाता है। यह सबसे बड़ा झूठ है। गरीब रेहड़ी वाला फुटपाथ पर एक टोकरी लगाकर इज्जत से कमाना चाहता है, लेकिन यह माफिया उसे भी 500 रुपये रोज हफ्ता देने पर मजबूर करता है। असली गरीब तो इस सिस्टम में और गरीब हो रहा है।
हाईकोर्ट की फटकार काफी नहीं है। इलाज सर्जरी से होगा, बैंड-एड से नहीं।
पहला - दिल्ली में हर मार्केट की ड्रोन मैपिंग हो। 2021 की सैटेलाइट फोटो और आज की फोटो मिलाई जाए, साफ पता चल जाएगा कि कितनी सड़क घेरी गई है।
दूसरा - अवैध पार्किंग को भारतीय न्याय संहिता के तहत जबरन वसूली और धोखाधड़ी मानकर केस दर्ज हो। सिर्फ चालान से कुछ नहीं होगा।
तीसरा - एम सी डी और पुलिस का जॉइंट टास्क फोर्स नहीं, जॉइंट जवाबदेही तय हो। हर हफ्ते की वीडियोग्राफी कोर्ट में जमा हो।
और आखिरी - दिल्ली वालों को खुद आवाज उठानी होगी। जब तक हम 50 रुपये देकर अवैध पार्किंग में गाड़ी लगाते रहेंगे और फुटपाथ पर सामान बेचने वाली दुकान से ही शॉपिंग करते रहेंगे, तब तक यह माफिया जिंदा रहेगा।
हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है। अब बारी दिल्ली की जनता की है कि वह नाराजगी को आंदोलन बनाए। क्योंकि सड़कें किसी अफसर या माफिया की बपौती नहीं, हमारे टैक्स से बनी हैं और हमारे चलने के लिए हैं।