पाकिस्तान के सैन्य इतिहास में अभूतपूर्व घटनाक्रम में, जनरल असीम मुनीर देश के सबसे शक्तिशाली जनरल के रुप में उभरे हैं। उन्होंने बिना सड़कों पर टैंक उतारे या तख्तापलट किए, बल्कि संवैधानिक और संसदीय मार्ग से असीमित शक्ति हासिल की है। पाकिस्तान के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ) और आर्मी चीफ के रूप में उनकी वर्तमान स्थिति उन्हें सैन्य कमांड ढांचे का निर्विवाद सुपर बॉस बनाती है। यह बदलाव पाकिस्तान की शहबाज सरकार द्वारा संसद से पारित डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान एक्ट 2026 और नेशनल कमांड अथॉरिटी (संशोधन) एक्ट 2026 के माध्यम से हुए, जिन्हें राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की मंजूरी भी मिल गई है।
ये कानून नवंबर 2025 में पारित हुए 27वें संविधान संशोधन का हिस्सा हैं, जिसने देश के सैन्य कमांड ढांचे को मौलिक रूप से बदल दिया। 27वें संशोधन ने चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीजेसीएससी) के पद को समाप्त कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ) का नया पद सृजित किया। जनरल मुनीर को देश का पहला सीडीएफ नियुक्त किया गया, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह इस समय सीडीएफ के साथ-साथ सेना प्रमुख के पद की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं।
जनरल मुनीर की यह सुपर पॉवर रातोंरात नहीं मिली, बल्कि 27वें संविधान संशोधन के साथ ही इसकी शुरुआत हुई, इस संविधान संशोधन ने पाकिस्तान के मिलिट्री कमांड ढांचे को पूरी तरह बदल दिया। इस दोहरी भूमिका के चलते वह पाकिस्तानी थल, नौसेना और वायु सेना के सर्वोच्च कमांडर बन गए हैं। नए रक्षा बल मुख्यालय की कमान संभालने वाले मुनीर अब राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और सशस्त्र बलों से संबंधित मामलों पर प्रधानमंत्री के मुख्य सैन्य सलाहकार के रूप में भी कार्य करेगा।
इन संवैधानिक परिवर्तनों ने न केवल उनके पद की शक्ति बढ़ाई है, बल्कि उनका कार्यकाल भी नए सिरे से निर्धारित किया है। पहले उन्हें 2027 में सेवानिवृत्त होना था, लेकिन सीडीएफ के नए 5 साल के कार्यकाल के कारण अब वह कम से कम नवंबर 2030 तक इस शक्तिशाली पद पर बने रहने वाले है। पाकिस्तान ने एक और महत्वपूर्ण पद, नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड के कमांडर का भी सृजन किया है। यह चार-स्टार वाला पद देश की रणनीतिक सेनाओं के ऑपरेशनल इंटीग्रेशन के लिए जिम्मेदार है, और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने लेफ्टिनेंट जनरल आमिर रजा को 4-स्टार जनरल रैंक पर प्रमोट करने के बाद इस पद पर तैनात किया है।
पाकिस्तान के सैन्य इतिहास को देखकर ये बदलाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। अतीत में सेना ने चार बार तख्तापलट कर देश पर शासन किया है और नागरिक सरकारों पर भी उसका गहरा प्रभाव रहा है। लेकिन इस बार, सेना ने सड़कों पर टैंक उतारने के बजाय, संवैधानिक और संसदीय माध्यमों से अपनी शक्ति बढ़ाई है। हालांकि, आलोचक इस 27वें संविधान संशोधन को संवैधानिक तख्तापलट करार दे रहे हैं, उनका मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में सेना के प्रभुत्व को और मजबूत करता है। विशेष रूप से, इस संशोधन ने शीर्ष सैन्य अधिकारियों को जीवन भर के लिए आपराधिक मुकदमों से छूट भी प्रदान की है।