अमेरिका-ईरान जंग को छह महीने पूरे होने के बाद भी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच पाई है। इस दौरान दो बार युद्धविराम की कोशिश हुई और शांति समझौते को लेकर भी बातचीत हुई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच स्थायी सहमति नहीं बन सकी। अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए सैन्य कार्रवाई से आगे आर्थिक मोर्चे पर अभियान शुरू किया है। अमेरिकी प्रशासन ने इसका नाम ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ रखा है। इसका उद्देश्य ईरान को वैश्विक वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्था से पूरी तरह अलग-थलग करना है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने 24 अगस्त को अभियान की घोषणा करते हुए कहा कि वॉशिंगटन ईरान को राहत देने वाली हर वित्तीय जीवनरेखा को निशाना बनाएगा। ‘आउटकास्ट’ का अर्थ ऐसे व्यक्ति या समूह से है जिसे समाज से बाहर कर दिया गया हो। आर्थिक संदर्भ में इसका मतलब किसी देश को बैंकिंग, अंतरराष्ट्रीय भुगतान, विदेशी निवेश और वैश्विक व्यापार व्यवस्था से अलग-थलग करना है, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था के लिए सामान्य तरीके से कारोबार करना मुश्किल हो जाए।
अमेरिकी रणनीति केवल ईरान तक सीमित नहीं है। ईरानी तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों, तेल की ढुलाई करने वाली शिपिंग कंपनियों, ईरानी धन के लेनदेन में मदद करने वाले वित्तीय संस्थानों और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले संगठनों पर भी कार्रवाई की जा सकती है। यानी ईरान की आय बढ़ाने या उसके वित्तीय नेटवर्क को सक्रिय रखने में मदद करने वाली संस्थाओं को भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इस रणनीति में चीन सबसे अहम कड़ी बनकर उभर रहा है। ईरान के समुद्री मार्ग से होने वाले तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा चीन खरीदता है। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध भी मजबूत हैं। ऐसे में अभियान की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि चीन अमेरिकी दबाव के सामने किस तरह की रणनीति अपनाता है।
भारत, यूएई, तुर्की और इराक जैसे देशों के भी ईरान के साथ आर्थिक संबंध हैं, इसलिए इन देशों की कंपनियां भी अमेरिकी कार्रवाई के दायरे में आ सकती हैं। अमेरिकी दबाव का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। ईरानी मुद्रा रियाल कमजोर हुई है और डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक दबाव ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर कर सकता है, लेकिन इससे यह जरूरी नहीं कि तेहरान अमेरिका की सभी शर्तें मान ले। यदि वॉशिंगटन अपनी रणनीति में सफल रहता है तो ईरान के लिए तेल बेचने, विदेशी मुद्रा हासिल करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जारी रखने के रास्ते काफी सीमित हो सकते हैं।